भारत के आंध्रा की कोल्लूर की खान से निकला यह जादुई रत्न, यह पौराणिक रत्न, जिसे तब ‘स्यमंतक मणि’ के नाम से जाना जाता था, कभी तेलंगाना के वारंगल के काकतीय मंदिर की देवी की आंख बना, फिर दिल्ली के सुल्तानों के ताज की शान, और आखिरकार लूट का सबसे बड़ा प्रतीक। यह है कोहिनूर हीरा।
सन् 1739 में जब फारस का आक्रमणकारी नादिर शाह ने भारत पर धावा बोला, तो उसने केवल खजाना ही नहीं, भारत की इस अनमोल शान को भी लूट लिया। उसी ने इसे नाम दिया, कोह-ए-नूर… यानी रोशनी का पर्वत। आइए, हम समय के पहिये को पीछे घुमाते हैं और जानते हैं कि यह हीरा ‘शेर-ए-पंजाब’ महाराजा रणजीत सिंह के पास कैसे पहुंचा। क्या है इसको पंजाब लाने के पीछे की कहानी?

जिस कहानी की हम बात कर रहे हैं…, उस वक्त यह कोहिनूर हीरा अफगान राजा शाह शुजा दुर्रानी के पास था। शाह शुजा दुर्रानी जो कि 1803 में शासक बना, लेकिन सत्ता की भूख ने भाई को ही भाई का दुश्मन बना दिया। शाह शुजा के भाई महमूद शाह दुर्रानी ने उसे 1809 में गद्दी से हटा दिया। अब शाह शुजा के जान के लाले पड़ गए। शाह शुजा अपनी जान बचाने के लिए भाग कर कश्मीर आ पहुंचा, जहां कश्मीर के उस वक्त के गवर्नर अता मोहम्मद खान को उसके पास कोहिनूर हीरा होने का पता लगा, तो उसने लगभग 1812 ई. में कोहिनूर के लालच में शाह शुजा को धोखे से कैद कर लिया। वफा बेगम जो कि अफगान शासक शाह शुजा दुर्रानी की पत्नी थीं, उन्हें अपने पति को कैद से छुड़ाने के लिए ऐसे मददगार की जरूरत थी, जो उनके पति शाह शुजा को कश्मीर के गवर्नर की कैद से छुड़ा सके। और उन दिनों महाराजा रणजीत सिंह की बहादुरी के चर्चे अफगानों से छुपे नहीं थे।

BBC-शाह शुजा
इस दौरान, लाहौर में रणजीत सिंह के भव्य दरबार में एक बेबस महिला के रूप में वफा बेगम मदद के लिए पहुंची। वफा बेगम ने रणजीत सिंह के सामने मदद की गुहार लगाई और वादा किया कि यदि वह उनके पति शाह शुजा को अता मोहम्मद की कैद मुक्त करा देंगे, तो कोहिनूर हीरा वह रणजीत सिंह जी को सौंप देंगी। महाराजा ने सोचा कि यही मौका है भारत की प्रतिष्ठा वापिस लाने का, जिसे विदेशी आक्रमणकारी भारत से छीनकर ले गए थे। रणजीत सिंह ने बिना देर किए इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।
साल 1812 की दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में महाराजा रणजीत सिंह की सेना अफगान वजीर फतेह खान से बात करके पीर पंजाल की बर्फीली पहाड़ियों और कठिन रास्तों से होते हुए, तकरीबन 12,000 सैनिकों के साथ आगे बढ़ी, जिसका नेतृत्व दीवान मोहकम चंद कर रहे थे। फतेह खान, जो कि कश्मीर जैसे समृद्ध प्रांत को हथियाकर कोहिनूर भी अपने कब्जे में लेना चाहता था ने महाराजा रणजीत सिंह से 1812 में गठबंधन किया था।
महाराजा रणजीत सिंह की सेना और वजीर फतेह खान कश्मीर पर आक्रमण की योजना के साथ आगे बढ़े। वजीर फतेह खान ने सिखों का साथ देने का दिखावा किया, जबकि अंदर ही अंदर वह खुद शाह शुजा को पकड़कर कोहिनूर हथियाना चाहता था। लेकिन दीवान मोहकम चंद ने फतेह खान का इरादा भांप लिया। और उसके वहां पहुंचने से पहले ही उन्होंने शेरगढ़ किले पर धावा बोल दिया और जीत का परचम लहरा दिया। अता मोहम्मद खान को पराजित करके शाह शुजा को उसकी कैद से मुक्त कराकर लाहौर ले आए।
आजाद होने के बाद शाह शुजा की नीयत बदल गई। उसने एक हीरा रणजीत सिंह को सौंपा, लेकिन वह नकली निकला। यह साफ था कि उसने असली कोहिनूर छुपा लिया था। रणजीत सिंह ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझा। अब यह केवल एक सौदे की बात नहीं रह गई थी, बल्कि यह उनके सम्मान और सत्ता का प्रश्न बन चुका था। उन्होंने वफा बेगम और शाह शुजा से अपना वादा पूरा करने की बात कही, लेकिन शाह शुजा को कोई फर्क नहीं पड़ा।
आखिरकार जून 1813 में वह क्षण आया जब रणजीत सिंह ने स्वयं इस समस्या का समाधान निकालने का निश्चय किया। लाहौर की मुबारक हवेली में शाह शुजा और रणजीत सिंह आमने-सामने बैठे। इस बार रणजीत सिंह ने तलवार नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘पगड़ी बदल’ (turban exchange Ceremony) की परंपरा का प्रस्ताव रखा। उस समय पगड़ी बदलना भाईचारे और विश्वास का प्रतीक माना जाता था, जिसे ठुकराना लगभग असंभव था। शाह शुजा ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जैसे ही दोनों ने अपनी पगड़ियां बदलीं, उसी क्षण इतिहास ने करवट ली। कहा जाता है कि शाह शुजा ने असली कोहिनूर अपनी पगड़ी में छुपा रखा था। पगड़ी बदलते ही वह हीरा रणजीत सिंह के हाथों में आ गया। बिना किसी युद्ध, बिना खून-खराबे के, रणजीत सिंह ने दुनिया का सबसे प्रसिद्ध हीरा हासिल कर लिया।
यह केवल एक जीत नहीं थी, बल्कि यह बुद्धिमत्ता, धैर्य और रणनीति की एक अद्भुत मिसाल थी। महाराजा रंजीत सिंह ने इसे अपने आर्मलेट में लगवा लिया और जहां भी जाते अपने साथ ले जाया करते थे।

