कोलकाता के बिजोन सेतु पर 30 अप्रैल 1982 की सुबह जो हुआ, उसे सिर्फ ‘उन्मादी भीड़ की करतूत’ कहकर टाल दिया गया। इसी दिन भड़की हिंसा में आनंद मार्ग के 17 साधुओं की पीट-पीटकर और जिंदा जलाकर हत्या कर दी गई। जिसके आरोप लगे कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर। घटना के 44 वर्ष बीत जाने के बाद भी, आज तक सबूतों के अभाव में पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिला।
लेकिन इस घटना का एक दबा हुआ पक्ष भी है। जिसकी चर्चा आमतौर पर नहीं होती। यह कहानी है, एक आईएएस अधिकारी की, जिसने फाइलों के पीछे छिपे सच को पढ़ लिया था। इस अधिकारी की नाम था शेर सिंह। यदि उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाता, तो यह प्रश्न अवश्य उठता कि उस दौरान बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार केवल असफल थी, या फिर जानबूझकर निष्क्रिय?
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