Hindu Orphan Relief Movement 1897: वर्ष 1897 के आरम्भ में मध्य भारत और आसपास के इलाकों की धरती, जैसे रूठ गई थी। बारिश ने साथ छोड़ा, खेतों में अनाज नहीं उगा और गांवों में चूल्हे ठंडे पड़ने लगे। 1896–97 का यह अकाल 1896 के आरम्भ में बुंदेलखंड में आरम्भ हुआ और इसने भारत के अनेक हिस्सों को प्रभावित किया, जिनमें यूनाइटेड प्रोविंसेस, सेंट्रल प्रोविंसेस और बरार, बिहार, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्से और पंजाब का हिसार जिला शामिल थे। इस अकाल ने राजपूताना (उत्तरी और पूर्वी) की रियासतों, मध्य भारत के कुछ हिस्सों और हैदराबाद को भी प्रभावित किया। अकाल से सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों में वे बच्चे थे, जिनके माता-पिता की भूख और बीमारी के चलते मृत्यु हो थी।
उन्हीं दिनों लाला लाजपत राय, जो आर्य समाज से जुड़े हुए थे, उनके पास अकाल पीड़ित हिंदू परिवारों और बेसहारा बच्चों की खबरें लगातार पहुंच रही थीं। उनके सामने सवाल केवल भूख से जूझते लोगों को भोजन देने का नहीं था, वह यह भी देख रहे थे कि जिन बच्चों का कोई सहारा नहीं बचा, उनके लिए ईसाई मिशननरी संस्थानों ने आश्रय देने के नाम पर धर्मांतरण का खेल शुरू कर दिया था।
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