यह संघर्ष वर्ष 1840 में शुरू हुआ, जब अमेरिकी प्रेस्बिटेरियन मिशन के पादरी जोसेफ ओवेन प्रयागराज पहुंचे। उनके लिए यह मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन भर नहीं था, बल्कि वह ‘स्वर्ण भूमि’ थी, जहां एक साथ हजारों लोगों को प्रभावित किया जा सकता था, धर्मांतरित किया जा सकता था। पर वह यह नहीं समझ पाए कि वह एक ऐसी सभ्यता में प्रवेश कर रहे हैं, जो उनकी कल्पना से कहीं अधिक प्राचीन और कहीं अधिक सशक्त थी।
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