Tag: Military

  • जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू का अहंकार : जब एक अपमान बन गया ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय

    जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू का अहंकार : जब एक अपमान बन गया ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय

    भारत के इतिहास का एक ऐसा युद्ध नायक, जिसने दूसरे विश्व युद्ध में दुश्मनों को धूल चटाई और 1948 में पाकिस्तान को हराया, लेकिन उसे अपने ही देश के रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा अपमान और षड्यंत्र का सामना करना पड़ा। वह थे जनरल कोडांडेरा सुबैया थिमैया, जो 1957 से 1961 तक भारतीय सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रहे। उन्होंने नेहरू को तब आगाह किया, जब देश में ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का खोखला नारा गूंज रहा था, जबकि सीमा पर चीन विस्तारवाद की चालाकियां चल रहा था।

    जनरल थिमैया ने चीन की इस नीति को पहले ही भांप लिया था। लेकिन नेहरू और रक्षामंत्री वीके कृष्णा मेनन ने उनकी चेतावनियों को न केवल ठुकराया, बल्कि उन्हें अपमानित कर सेनाध्यक्ष पद के इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। यह सच्ची कहानी है ‘एक वीर की राष्ट्रनिष्ठा और दो लोगों के अहंकार के बीच हुई टक्कर की’ जिसके चलते हमें चीन के हाथों बडा भू-भाग गंवाना पड़ा।

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  • निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    गलवान और ऑपरेशन सिंदूर यह साबित करते हैं कि परमाणु हथियारों से लैस शत्रुओं के सामने मजबूती से खड़े रहने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध (डिटरेंस) आवश्यक है। भारत और उसकी सीमाओं की कहानी बताती है कि निरस्त्रीकरण एक व्यक्तिपरक अवधारणा (सब्जेक्टिव) है।  

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  • कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    बर्मा (आज का म्यांमार) के घने जंगलों, पहाड़ियों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय छिपा है, जिसे इतिहास में हाशिये पर रखा गया। यह कहानी किसी विशाल सेना की नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चयी भारतीय सैन्य अधिकारी गुरबख्श सिंह ढिल्लों की है।

    उस दौर में, जब ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति था, तब आजाद हिंद फौज के इस अधिकारी कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। बर्मा के घने जंगलों में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना आगे नहीं बढ़ पाई थी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों का अंग्रेजी सेना से यह कोई साधारण टकराव नहीं था, बल्कि वह ऐतिहासिक क्षण था, जब भारतीय सैनिकों ने पहली बार ब्रिटिश सरकार को सीधे युद्धभूमि में चुनौती दी थी।

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