जब हम 3 जनवरी को भारत की पहली महिला हेडमिस्ट्रेस, सावित्रीबाई फुले की जयंती मना रहे हैं, तो आइए, 1874 में वापस चलते हैं, जब उन्होंने एक विधवा महिला के छोड़े हुए नवजात बच्चे को गोद लिया और उसका नाम यशवंतराव बालक फुले रखा। ऐसे समय में जब विधवा महिलाओं के बच्चों और सेक्स ट्रैफिकिंग की शिकार महिलाओं के बच्चों को ‘नाजायज’ कहा जाता था, सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले का यह फैसला भारत में एक अनाथ बच्चे को प्यार और मकसद भरी जिंदगी देने के शुरुआती और सबसे मजबूत उदाहरणों में से एक था।
लेकिन इस कहानी को समझना जरूरी क्यों है? जब समाज इन बच्चों को जीने नहीं देना चाहता था, तब सावित्रीबाई ने ऐसा साहसी कदम कैसे उठाया और एक अनाथ बच्चे को गोद लेने का सावित्रीबाई का फैसला आज भी कैसे गूंजता है? आज, हम आगे के आर्टिकल में इन सभी सवालों के जवाब देंगे।
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