18 जुलाई 1948 की वह काली रात…
तिथवाल की पहाड़ियों पर हर तरफ बारूद की गंध फैली हुई थी। ऊपर से दुश्मन की मशीन गनें आग उगल रही थीं और नीचे भारतीय सैनिक मौत से लड़ते हुए पहाड़ी पर चढ़ रहे थे। तभी गोलियों और धमाकों के बीच एक ऐसी गर्जना गूंजी, जिसने दुश्मन की रूह तक हिला दी— “राजा रामचंद्र की जय!”
यह आवाज थी पीरू सिंह शेखावत की।
उस सैनिक की, जिसने अकेले दुश्मन की पूरी पोस्ट को तबाह कर दिया और खुद मिट्टी में मिल गया, लेकिन तिथवाल की रिज पर भारत का मस्तक झुकने नहीं दिया।

