भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में, कुछ मेल-जोल केवल राजनीतिक नहीं थे, वे पूरे एक युग के लिए मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ थे। ऐसा ही एक बंधन था रवींद्रनाथ टैगोर, वह कवि जो अहिंसा के उपासक थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच, जो जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे। उनके बीच केवल आपसी सम्मान ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक जुड़ाव था, जो राष्ट्र के प्रति अटूट प्रेम से ओत-प्रोत था। यदि एक का योगदान कविता था, तो दूसरे का योगदान वह क्रांति थी, जिसने उन कविताओं में प्राण फूंक दिए। यह इस बात का विश्लेषण है कि कैसे एक कवि ने अपने शब्दों के माध्यम से एक योद्धा के लिए सुरक्षा-कवच का काम किया, ठीक उस समय, जब वह राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।
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दिसंबर 1971 फ्लैशबैक, जिस दिन राम को बनाया गया था निशाना : पेरियार, द्रविड़वाद और सेलम विरोध प्रदर्शन
24 दिसंबर को ई.वी. रामासामी, जिन्हें पेरियार के नाम से जाना जाता है, की पुण्यतिथि है। जहां एक ओर उनके अनुयायी इस दिन को उत्सव के रूप में मनाते हैं, वहीं यह दिन उनकी वैचारिक विरासत से जुड़े सबसे विवादास्पद घटनाओं में से एक को भी फिर से याद दिलाता है, 1971 में तमिलनाडु के सेलम में एक सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन, जहां एक बड़े राजनीतिक एजेंडे के हिस्से के रूप में भगवान राम और रामायण को जान-बूझकर निशाना बनाया गया था।
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