11 अगस्त 1961 को जब दादरा और नगर हवेली आधिकारिक रूप से भारत का केंद्रशासित प्रदेश बना, तब संसद ने केवल एक कानूनी प्रक्रिया पूरी की थी। इस क्षेत्र की वास्तविक मुक्ति तो सात साल पहले हो चुकी थी। 2 अगस्त 1954 को सिलवासा में तिरंगा फहरा दिया गया था और लगभग 170 सालों से चला आ रहा पुर्तगाली शासन समाप्त हो गया था। लेकिन यह विजय अचानक नहीं मिली थी। इसके पीछे महीनों की गुप्त योजना, धन जुटाने के अभियान, प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की तैयारी और कई साहसिक अभियानों की कहानी छिपी हुई है।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया था, लेकिन दादरा और नगर हवेली, गोवा, दमन और दीव की तरह अभी भी पुर्तगाली शासन के अधीन थे। पुर्तगाल ने दादरा पर 1783 में और नगर हवेली पर 1785 में अधिकार स्थापित किया था। लगभग 487 वर्ग किलोमीटर भूखंड वाले इन इलाकों में 72 गांव थे और उस समय उनकी आबादी लगभग 42,000 थी, जिनमें अधिकांश वारली जनजाति के लोग थे। स्वतंत्र भारत के बीचोंबीच मौजूद यह पुर्तगाली क्षेत्र राष्ट्रवादियों के लिए एक चुनौती बना हुआ था।
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