भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में, कुछ मेल-जोल केवल राजनीतिक नहीं थे, वे पूरे एक युग के लिए मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ थे। ऐसा ही एक बंधन था रवींद्रनाथ टैगोर, वह कवि जो अहिंसा के उपासक थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच, जो जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे। उनके बीच केवल आपसी सम्मान ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक जुड़ाव था, जो राष्ट्र के प्रति अटूट प्रेम से ओत-प्रोत था। यदि एक का योगदान कविता था, तो दूसरे का योगदान वह क्रांति थी, जिसने उन कविताओं में प्राण फूंक दिए। यह इस बात का विश्लेषण है कि कैसे एक कवि ने अपने शब्दों के माध्यम से एक योद्धा के लिए सुरक्षा-कवच का काम किया, ठीक उस समय, जब वह राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।
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सुभाष चंद्र बोस ने सत्ता नहीं खोई, बल्कि उन्होंने सत्ता को ठुकराया था
हम सभी जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के एक सक्रिय सदस्य थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पार्टी के भीतर वह इतने लोकप्रिय थे कि महात्मा गांधी और पंडित नेहरू जैसे बड़े नेता भी उनसे असुरक्षित और भयभीत महसूस करते थे? खैर, यह लेख इतिहास के इसी पहलू को खंगालेगा, जिसमें हम आपको बताएंगे कि कैसे इन नेताओं के लिए स्वतंत्रता का मुद्दा तो पृष्ठभूमि में था, लेकिन असल में सत्ता की भूख ही वह अंतर्निहित शक्ति थी, जो उनके संघर्ष को आगे बढ़ा रही थी।
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