एक शहर, दो सदियां, एक पैटर्न, बालाकोट की कहानी कुछ ऐसी है, जहां 19वीं सदी के ‘जिहाद’ के नारे और 21वीं सदी की ‘फिदायीन फैक्ट्री’ एक ही पहाड़ियों और घाटियों के बीच पनपते दिखते हैं। कभी यह जगह सैयद अहमद बरेलवी के अनुयायियों के लिए मजहबी युद्ध का मंच थी, तो बाद में यही इलाका जैश-ए-मोहम्मद (जैश) जैसे मजहबी आतंकियों के लिए तहरीक और ट्रेनिंग की जमीन बना।
पाकिस्तान में बालाकोट, खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत के मानसेहरा जिले में कुन्हार नदी (काघन घाटी) के किनारे स्थित एक शहर है
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