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  • मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब

    मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब

    मोगा 1989 जून, वो दिन जब पार्क बन गया था रणक्षेत्र और निहत्थे लोग हौसले के साथ गोलियों के सामने खड़े रहे। यह सिर्फ हमला नहीं था, साहस की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जहां डर नहीं, बल्कि अंत में संकल्प जीता।

    1990 का पंजाब…

    एक ऐसा समय, जब हवा भी डरकर बहती थी। गांव हों या शहर, हर तरफ एक ही सवाल था, ‘अगला निशाना कौन?’ 

    लेकिन इसी अंधेरे दौर में, कुछ लोग थे, जो हर सुबह बिना डरे एक मैदान में इकट्ठा होते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि मन में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संकल्प होता था। वे थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक। आज हम आपको बताएंगे, उस नरसंहार के बारे में जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 25 जून1989, वो तारीख जब अलगाववादियों ने विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत की अखंडता में विश्वास रखने वाले संगठन को डराकर चुप कराना चाहा, पर ये ना हो सका।

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    आपका आतंकवादी या मेरा? ISYF और चरमपंथी समूहों के साथ UK का संदिग्ध रवैया

    लंदन, 30 सितंबर 2012 : एक जनरल का मौत से सामना

    इंडियन आर्मी के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ अपनी पत्नी के साथ मार्बल आर्च के पास घूम रहे थे, तभी तीन लोगों ने उनपर हमला कर दिया। एक आदमी, जो इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (ISYF) से जुड़ा था, ने उनकी गर्दन और जबड़े पर 12 इंच का घाव कर दिया। बराड़ की पत्नी को धक्का देकर नीचे गिरा दिया गया। हमलावर एक प्लान किए गए हमले के बाद भाग गए।

    हमलावरों ने कई दिनों तक उन पर नजर रखी थी।  जब तीनों हमलावर पकड़े गए, तो UK की कोर्ट ने तीनों को लंबी सजा सुनाई। यह कोई रैंडम स्ट्रीट क्राइम नहीं था। बराड़, जिन्होंने 1984 में गोल्डन टेंपल से मिलिटेंट्स को हटाने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार को लीड किया था, खालिस्तान एक्सट्रीमिस्ट्स के लिए एक टॉप टारगेट थे।

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