वर्ष 1910 के भूमकाल विद्रोह के दौरान एक ऐसा वीरतापूर्ण पल आया, जब बस्तर के घने जंगलों में जनजातीय नायक वीर गुंडाधुर के नेतृत्व में तीर-कमान और कुल्हाड़ी से लैस आदिवासी योद्धाओं ने ब्रिटिश सेना को घेर लिया। ब्रिटिश सेना के कैप्टन गेयर सहित अंग्रेज सैनिक जान बचाकर मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सच्चाई है। कैसे बस्तर के नेतानार गांव में जन्में धुरवा जनजातीय समाज के युवक वीर गुंडाधुर ने ब्रिटिश साम्राज्य को सीधी चुनौती दी।
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आदिवासी कुल्हाड़ियां जिन्होंने 21 ब्रिटिश सैनिकों का शिकार किया : महिलाओं के नेतृत्व में संथाल विद्रोह—फूलो-झानो
साम्राज्य हमेशा अपनी सैन्य शक्ति पर गर्व करते हैं, लेकिन एक ऐसी गर्जना थी जिससे साबित हुआ कि आत्म-सम्मान के सामने वह गर्व कितना तुच्छ है।
1855 में, झारखंड के जंगलों में, बिजली की दो कौंधों की तरह दो युवतियां एक ब्रिटिश सैन्य शिविर की ओर लपकीं। वह शिविर अपनी आधुनिक एनफील्ड राइफलों के दम पर खुद को अजेय मानकर इतरा रहा था। वे ऐसी वीरांगनाएं थीं, जो ऐसे आगे बढ़ीं, मानो स्वयं ‘वन-माता’ ने ही कोई उग्र रूप धारण कर लिया हो। उन दोनों के हाथों में पैनी कुल्हाड़ियां थीं और आंखों में ज्वालामुखी दहक रहे थे। भोर होते-होते, 21 ब्रिटिश सैनिकों के सिर उनके धड़ों से अलग हो चुके थे। युद्ध के विश्व इतिहास में पहले कभी न देखी गई यह ‘नरसंहार-लीला’ किसी और ने नहीं, बल्कि सिदो-कानू की बहनों—फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू ने रची थी।
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