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  • जब ब्रिटिश अदालतें ऐसी भाषा में बोलीं, जिसे लोग पढ़ नहीं सकते थे :  भारतेन्दु हरिश्चंद्र का हिंदी के लिए संघर्ष 

    जब ब्रिटिश अदालतें ऐसी भाषा में बोलीं, जिसे लोग पढ़ नहीं सकते थे :  भारतेन्दु हरिश्चंद्र का हिंदी के लिए संघर्ष 

    उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के करोड़ों लोगों के लिए किसी मुकदमे की शुरुआत ऐसे सम्मन (नोटिस) से होती थी- 

    آپ کو بذریعۂ ہذا اس عدالت کے روبرو مقررہ تاریخ کو حاضر ہونے کا حکم دیا جاتا ہے۔

    क्या आप इसे समझ पाए? यही भाषा ब्रिटिश राज में अदालत के आदेशों में प्रयोग होती थी। आम ग्रामीण या वह व्यक्ति, जिसे उर्दू नहीं आती थी, इस संदेश का अर्थ ही नहीं समझ पाता था।

    यह समझने के लिए कि अदालत ने उसे क्यों बुलाया है, एक गांव का व्यक्ति मजबूर होकर किसी मौलवी या मुंशी के पास जाता, जो उसे पैसे लेकर इसका अर्थ समझाता, “आपको एतद् द्वारा निर्देशित किया जाता है कि आप नीचे दी गई तारीख को इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित हों।” या अंग्रेजी में- “You are hereby summoned to appear before this Court on the date specified below.”

    इस प्रकार, अदालत और नागरिक के बीच भाषा की एक दीवार खड़ी थी। न्याय आम आदमी के लिए महंगा सौदा बन गया था। लेकिन ऐसा क्यों हुआ? और आज हमें न्यायालय के सम्मन हिंदी में क्यों मिलते हैं?

    दरअसल, ब्रिटिश शासन ने भाषा को बांटो और राज करो (Divide and Rule) की नीति का एक औजार बना दिया था और हमारे पूर्वजों में कई ऐसे थे जिन्होंने इस अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। उन्हीं में से एक थे भारतेन्दु हरिश्चंद्र।

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