उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के करोड़ों लोगों के लिए किसी मुकदमे की शुरुआत ऐसे सम्मन (नोटिस) से होती थी-
“آپ کو بذریعۂ ہذا اس عدالت کے روبرو مقررہ تاریخ کو حاضر ہونے کا حکم دیا جاتا ہے۔”
क्या आप इसे समझ पाए? यही भाषा ब्रिटिश राज में अदालत के आदेशों में प्रयोग होती थी। आम ग्रामीण या वह व्यक्ति, जिसे उर्दू नहीं आती थी, इस संदेश का अर्थ ही नहीं समझ पाता था।
यह समझने के लिए कि अदालत ने उसे क्यों बुलाया है, एक गांव का व्यक्ति मजबूर होकर किसी मौलवी या मुंशी के पास जाता, जो उसे पैसे लेकर इसका अर्थ समझाता, “आपको एतद् द्वारा निर्देशित किया जाता है कि आप नीचे दी गई तारीख को इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित हों।” या अंग्रेजी में- “You are hereby summoned to appear before this Court on the date specified below.”
इस प्रकार, अदालत और नागरिक के बीच भाषा की एक दीवार खड़ी थी। न्याय आम आदमी के लिए महंगा सौदा बन गया था। लेकिन ऐसा क्यों हुआ? और आज हमें न्यायालय के सम्मन हिंदी में क्यों मिलते हैं?
दरअसल, ब्रिटिश शासन ने भाषा को बांटो और राज करो (Divide and Rule) की नीति का एक औजार बना दिया था और हमारे पूर्वजों में कई ऐसे थे जिन्होंने इस अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। उन्हीं में से एक थे भारतेन्दु हरिश्चंद्र।
अंग्रेजी राज में आज की हिंदी तब की उर्दू थी : सत्ता तय करती थी भाषा
आज हिंदी आसानी से बहती है, सड़कों के बोर्डों पर, विद्यालयों में और न्यायालयों में भी। हम इसे स्वाभाविक मानते हैं, बिना सवाल किए। पर 1830 के दशक में स्थिति बिल्कुल उलट थी। तब हिंदी की कोई सरकारी हैसियत नहीं थी।
सदियों तक मुगल शासन के दौरान फारसी भाषा अदालतों और प्रशासन की मुख्य भाषा रही। बाद में जब अंग्रेजों ने शासन संभाला, तो उन्होंने फारसी को हटाकर उर्दू थोप दी।
हिंदी का हाशिए पर जाना कोई संयोग नहीं था, यह ब्रिटिश नीति का सुनियोजित परिणाम था। सन् 1837 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने उत्तर भारत में अदालतों और प्रशासन में फारसी की जगह उर्दू को लागू कर दिया।
उर्दू, जो फारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती थी, पहले से ही कुछ गिने-चुने मुंशियों और क्लर्कों द्वारा प्रयोग की जाती थी। इससे प्रशासन की निरंतरता बनी रहती और अंग्रेजों के लिए यह बहुत सुविधाजनक था। लेकिन आम जनता जिसने इस लिपि को कभी नहीं सीखा था, अब उन्हीं मुंशियों पर निर्भर हो गई, जो अनुवाद करने के पैसे वसूल करते थे।
देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी, जो बहुसंख्यक जनता की बोलचाल की भाषा थी, सरकार, शिक्षा और न्याय तीनों से बाहर कर दी गई। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम न रहकर अंग्रेजों के हाथों नियंत्रण का औजार बन गई।
कैसे शुरु हुई भारतेन्दु की भाषा-क्रांति
इसी पृष्ठभूमि में 1850 में वाराणसी में जन्मे भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने एक साहसी और असाधारण निर्णय लिया। वह संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी, चारों भाषाओं में निपुण थे। वह चाहते, तो सत्ता की भाषा से जुड़ सकते थे, परंतु उन्होंने जनता की बोली, देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी को अपनाया।
उनका विश्वास इन पंक्तियों में झलकता है, जो आगे चलकर एक नारा बन गई-
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।”
उन्होंने हिंदी में नाटक लिखे, अखबार निकाले और जन-जागरण अभियान चलाया। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं ‘अंधेर नगरी’ और ‘भारत दुर्दशा’, समाज के भ्रष्टाचार, आर्थिक शोषण और मनमानी सत्ता के विरुद्ध तीखे व्यंग्य थे।
भारतेंदु कहते थे– “हमें वह शुद्ध, सरल, जनसामान्य द्वारा समझी जाने वाली बोली चाहिए, जो बहुसंख्यक जनता की परिचित लिपि में लिखी जाए। विज्ञान की पुस्तकों में यदि तकनीकी शब्दों का प्रयोग करना आवश्यक हो, तो कर सकते हैं, लेकिन बातचीत में, पारिवारिक पुस्तकों, बच्चों की किताबों, न्यायालय के पत्रों, अखबारों और व्याख्यानों में वही आसान और बोलचाल की भाषा चाहिए, जिसे सच में हमारी मातृभाषा कहा जा सके।”
वह दिन जब हिंदी अदालत में पहुंची
भारतेन्दु हरिश्चंद्र अच्छी तरह समझते थे कि साहित्य अकेले इस भाषाई अन्याय को नहीं दूर कर सकता। वर्ष 1882 में उन्होंने अपने आंदोलन को शासन स्तर पर पहुंचाया, जब उन्होंने हंटर आयोग (Hunter Commission) के सामने गवाही दी।
वहां उन्होंने बताया कि उर्दू में भेजे गए वो सम्मन (court summons) आम जनता के लिए क्या मायने रखते हैं, कैसे एक ऐसा न्याय-तंत्र, जो लोगों की भाषा में नहीं बोलता, दरअसल आम आदमी को न्याय से बाहर रखता है।
आयोग के सामने उन्होंने दोहराया, “हमें वह शुद्ध, सरल, जनसामान्य द्वारा समझी जाने वाली बोली चाहिए, जो बहुसंख्यक के लिए परिचित लिपि में लिखी जाती हो।”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह भाषा कहां-कहां प्रयोग होनी चाहिए, “बातचीत में, पारिवारिक शिक्षा की किताबों में, बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों में, न्यायालय के कागजों में, अखबारों में और सार्वजनिक व्याख्यानों में। हमें वही सरल और बोलचाल की भाषा चाहिए, जिसे सच्चे अर्थों में मातृभाषा कहा जा सके।”
उनका तर्क सीधा था कि जनता की भलाई के लिए अदालतों, प्रशासन और शिक्षा में जनभाषा (हिंदी) का प्रयोग आवश्यक है।
मृत्यु और विरासत
6 जनवरी 1885 में केवल 34 वर्ष की आयु में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का निधन हो गया, काफी पहले, जब उनकी कल्पना पूरी तरह साकार भी नहीं हुई थी।
वह यह देखने के लिए जीवित नहीं रहे कि एक दिन हिंदी अदालतों और सरकारी कार्यालयों की भाषा बन जाएगी। लेकिन उनका संघर्ष ही था कि पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं और बाद के स्वतंत्रता सेनानियों ने यह सुनिश्चित किया कि आज भारत का एक नागरिक जब अदालत से सम्मन प्राप्त करता है, तो वह किसी अनजानी लिपि में नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा हिंदी में होता है।

