हम सभी जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के एक सक्रिय सदस्य थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पार्टी के भीतर वह इतने लोकप्रिय थे कि महात्मा गांधी और पंडित नेहरू जैसे बड़े नेता भी उनसे असुरक्षित और भयभीत महसूस करते थे? खैर, यह लेख इतिहास के इसी पहलू को खंगालेगा, जिसमें हम आपको बताएंगे कि कैसे इन नेताओं के लिए स्वतंत्रता का मुद्दा तो पृष्ठभूमि में था, लेकिन असल में सत्ता की भूख ही वह अंतर्निहित शक्ति थी, जो उनके संघर्ष को आगे बढ़ा रही थी।
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मोरारजी देसाई : गांधीवाद या राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़? वह ‘एक फोन कॉल’ जिसे इतिहास कभी माफ नहीं कर सकता!
आज, पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसके पास परमाणु बम हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब इजराइल उसकी परमाणु शक्ति को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए तैयार था? इसके लिए, उन्होंने हमारी राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी, ‘R&AW’ से संपर्क किया। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा लिए गए एक फैसले ने… हमारे दुश्मन देश को और भी ज़्यादा मजबूत बना दिया। हां, यह एक कड़वी सच्चाई है जिसे इतिहास में कोई भी नकार नहीं सकता।

मोरारजी देसाई, छवि स्रोत : hindupost
राजनीति में, मोरारजी को अक्सर नैतिकता का शिखर माना जाता है, लेकिन उनका शासन भारतीय खुफिया तंत्र (R&AW) के लिए एक मृत्यु-पत्र साबित हुआ। मोरारजी का शासन इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे किसी व्यक्ति की अति-नैतिकता, अहिंसा और गांधीवाद राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाल सकते हैं।
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प्रतापगढ़ : जहां शिवाजी महाराज ने पहाड़ों को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया
नवंबर 1659 के महीने में, प्रतापगढ़ की ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर भारतीय इतिहास के सबसे निर्णायक युद्धों में से एक, प्रतापगढ़ का युद्ध हुआ। यहीं पर छत्रपति शिवाजी महाराज ने दूरदर्शिता और अद्वितीय सामरिक प्रतिभा से प्रेरित होकर, जावली के दुर्गम प्रतीत होने वाले पहाड़ों को एक अटूट किले में बदल दिया। उस दिन जो हुआ, वह केवल शक्तिशाली आदिलशाही सेनापति अफजल खान पर विजय नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि कैसे बुद्धि, भूभाग और स्वराज्य की भावना मिलकर क्रूर बल पर विजय प्राप्त कर सकती है।
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