मंगलौर की जिला अदालत उस दिन सामान्य नहीं थी। दीवारों के अंदर एक ऐसा निर्णय हुआ, जो मुगलकाल से चली आ रही रूढ़िवादी व्यवस्था को सीधी चुनौती थी।
हुआ कुछ यूं था कि वंचित समाज से आने वाले बाबू बेंदूर नाम के एक व्यक्ति, जिसने अनेकों परेशानियों का सामना करते हुए चौथी कक्षा पास की थी, उसकी जिला अदालत में क्लर्क के पद पर नियुक्ति हुई थी। और इसके पीछे थे, वकील कुडमुल रंगा राव। उन्होंने ही अपने प्रयासों से बाबू बेंदूर को नौकरी दिलवाई थी।
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