मंगलौर की जिला अदालत उस दिन सामान्य नहीं थी। दीवारों के अंदर एक ऐसा निर्णय हुआ, जो मुगलकाल से चली आ रही रूढ़िवादी व्यवस्था को सीधी चुनौती थी।
हुआ कुछ यूं था कि वंचित समाज से आने वाले बाबू बेंदूर नाम के एक व्यक्ति, जिसने अनेकों परेशानियों का सामना करते हुए चौथी कक्षा पास की थी, उसकी जिला अदालत में क्लर्क के पद पर नियुक्ति हुई थी। और इसके पीछे थे, वकील कुडमुल रंगा राव। उन्होंने ही अपने प्रयासों से बाबू बेंदूर को नौकरी दिलवाई थी।
लेकिन, शायद उन्हें यह नहीं पता था कि बाबू बेंदूर की यह नियुक्ति उनके लिए कितनी बड़ी चुनौती बन जाएगी। बाबू बेंदूर की नियुक्ति के बाद रुढ़िवादी सोच वाले कुछ लोगों ने इसका विरोध किया। गलियों में लोग चर्चा करने लगे कि एक पंचमा (वंचित समाज का व्यक्ति) अदालत की कुर्सी पर कैसे बैठ सकता है? अब कुडमुल रंगा राव समझ चुके थे कि यह प्रश्न सिर्फ एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा परीक्षा है।

कुडमुल रंगा राव- जन्म- 29 जून 1859, मृत्यु- 30 जनवरी 1928, इमेज सोर्स- Swarajyamag
बाबू बेंदूर की नियुक्ति का विरोध दिन पर दिन उग्र होता जा रहा था, उनके लिए अदालत तक पहुंचना जानलेवा हो गया था। उन्हें धमकियां दी जाने लगीं, स्थिति इतनी बिगड़ी कि अंग्रेज न्यायाधीश को हस्तक्षेप करना पड़ा। आखिर में उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया गया।
बाबू बेंदूर का सपना टूट गया। लेकिन यह वाकया कुडमुल रंगाराव के मन में उतर गया। उसी क्षण उन्होंने समझ लिया कि समस्या एक पद की नहीं, बल्कि गुलामी में उपजी रूढ़िवादी सोच की है। तभी उन्होंने वंचित हिंदू परिवारों की सामाजिक स्थिति में बदलाव लाने के लिए मन ही मन संकल्प लिया और इसे अपने जीवन का उद्देश्य मानकर जुट गए।
उस रात रंगा राव अपने घर नहीं लौटे। वे अदालत से सीधे उन बस्तियों में पहुंचे, जहां बाबू बेंदूर जैसे सैकड़ों लोग रहते थे। उन्होंने देखा कि यहां किसी भी बच्चे के हाथों में किताबें नहीं, बल्कि मजदूरी करने के लिए औजार हैं। उन्होंने महसूस किया कि जब तक इन लोगों तक शिक्षा नहीं पहुंचेगी, तब तक न्याय और समानता की बातें सिर्फ एक सपना भर हैं। कुछ ही समय में उन्होंने अपने वकालत के पेशा को छोड़कर, वंचितों के उत्थान का काम शुरू किया।
कुडमुल रंगा राव ने 1897 में दलित वर्ग मिशन (डीसीएम) की स्थापना की। उन्होंने वंचित बच्चों के लिए स्कूल खोलने की योजना बनाई। 1892 में मंगलौर के उर्वा-चिलिम्बी में उन्होंने पहला स्कूल खोला। इसकी शुरुआत एक फूस की झोंपड़ी में कुछ बच्चों के साथ हुई। दूसरा स्कूल मंगलौर शहर के कोर्ट हिल्स में खोला। इन स्कूलों को नाम दिया गया ‘पंचमा स्कूल’ इन स्कूलों में बच्चे सिर्फ अक्षर नहीं सीखते थे, बल्कि यह भी समझते थे कि वे भी उसी सनातन सभ्यता का हिस्सा हैं, जिससे रुढ़िवादिता के चलते उनको वंचित रखा गया। हालांकि ‘पंचमा स्कूल’ तक छात्रों को लाना इतना आसान नहीं था, क्योंकि बहुत से बच्चे अपने-माता पिता के साथ बंधुआ मजदूरी करने पर मजबूर थे, क्योंकि जीवन यापन करने के लिए यही उनका एकमात्र सहारा था। इसके लिए कुडमुल रंगा राव ने बच्चों के माता-पिता के साथ संपर्क स्थापित किया। उन्होंने कई रातें वंचितों की बस्तियों में बिताईं। साथ में बैठकर भोजन किया, ताकि भय और असमानता की दीवारें टूट सकें। जिसके बाद वह कई बच्चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराकर पंचमा स्कूलों तक लाने में सफल रहे।
लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था, उनके परिवार को रूढ़िवादिता के चलते विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें ताने और उपहास का सामना करना पड़ा। लेकिन राव का संकल्प अडिग था। उनकी मेहनत रंग ला रही थी, धीरे-धीरे वह दृश्य बदलने लगा, जिसे सदियों से अपरिवर्तनीय माना जाता था। जिन गलियों में वंचितों की परछाईं तक अशुभ मानी जाती थी, अब वहां स्कूल जाने के लिए बच्चों की कतारें लगती थीं। राव के प्रयासों से बच्चों को स्कूल में ही भोजन की व्यवस्था थी, ताकि भूख शिक्षा के मार्ग में बाधा न बने। राव ने बच्चों के माता-पिता को हर माह 2 आने की आर्थिक सहायता भी दी। ताकि उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया जा सके।
देखते ही देखते कुडमुल रंगा राव के पंचमा स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ने लगी, जिसके चलते 1892 और 1897 के बीच, 7 और पंचमा स्कूल खोले गए। जिनमें मंगलौर शहर में 3, उडुपी में 2 और पास के शहरों मुल्की और उल्लाल में 1-1 स्कूल था। उन्होंने वंचित समाज की छात्राओं को भी शिक्षा से जोड़ने के लिए 1897 में शेदिगुड्डे में एक महिला आवासीय स्कूल खोला। जिसका परिणाम हुआ कि अब वंचित समाज के लोग शिक्षा और सनातन संस्कृति, दोनों से जुड़ने लगे। एक नई सामाजिक क्रांति खड़ी हुई।
जिस घटना ने बाबू बेंदूर से उसकी नौकरी छीनी थी, उसी ने कुडमुल रंगा राव को वंचित समाज का मसीहा बना दिया। अदालत में वह हार हजारों झोंपड़ियों की जीत में बदल गई। रंगा राव ने यह सिद्ध करते दिखा दिया कि सनातन संस्कृति सीमित नहीं, बल्कि समस्त मानवता की धरोहर है। उन्होंने अन्याय को देखा, लेकिन मौन नहीं साधा। अपने जीवन को उन्होंने उस समाज के लिए समर्पित कर दिया, जिसे हाशिए पर छोड़ दिया गया था। यही कारण है कि आज भी मंगलौर की हवाओं में उनका नाम केवल स्मृति नहीं, बल्कि चेतना है, एक ऐसे महापुरुष के तौर पर, जिसने एक टूटी हुई नियुक्ति से अखंड सामाजिक क्रांति की नींव रख दी।
मंगलुरु स्थित कुडमुल रंगाराव का समाधि स्थल, इमेज सोर्स- Peepul Tree
कुडमुल रंगाराव का जन्म 29 जून 1859 को मद्रास प्रेसीडेंसी के कुडमुल गांव में हुआ। गरीब गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार से आने वाले रंगाराव ने शिक्षक व वकील रहते हुए जीवन वंचित समाज की शिक्षा और उत्थान को समर्पित किया। ब्रह्म समाज व आर्य समाज से जुड़े रंगाराव का निधन 30 जनवरी 1928 में हुआ। राव ने अपने वसीयत में लिखा था कि उनका अंतिम संस्कार वंचित समाज के लोगों द्वारा ही किया जाए। जिसके चलते तोटी वंचित समाज से आने वाले लोगों ने उनकी अर्थी को कंधा दिया और उनका अंतिम संस्कार किया था।

