Tag: Nepal

  • 1953 में माउंट एवरेस्ट पर पहली सफल चढ़ाई : बंबई से एवरेस्ट तक, वह अनकही कहानी कि कैसे भारत ने इसे संभव बनाया

    1953 में माउंट एवरेस्ट पर पहली सफल चढ़ाई : बंबई से एवरेस्ट तक, वह अनकही कहानी कि कैसे भारत ने इसे संभव बनाया

    29 मई, 1953 को, धरती के सबसे ऊंचे स्थान, माउंट एवरेस्ट (उस समय समुद्र तल से 8,848 मीटर ऊपर) पर दो लोग शान से खड़े थे, नेपाल के तेनजिंग नोर्गे शेरपा और न्यूजीलैंड के सर एडमंड हिलेरी। इन दोनों ने इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया था, क्योंकि वे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति बने थे। जाहिर है, यह सब अकेले दम पर मुमकिन नहीं था। तो, इस मिशन की सफलता सुनिश्चित करने के लिए पर्दे के पीछे रहकर किसने काम किया? उनमें से एक था, भारत, एक ऐसा देश जिसने जरूरी लॉजिस्टिकल सहायता दी और दिन-रात की वह अहम मेहनत की, जो माउंट एवरेस्ट से हजारों किलोमीटर दूर हुई थी। 

    आज, आइए हम समय के पहिये को पीछे घुमाएं और यह जानें कि भारत की लॉजिस्टिकल सहायता ने एवरेस्ट की पहली चढ़ाई में कैसे मदद की, जिसके बिना यह कभी भी संभव नहीं हो पाता।

    और पढ़ें
  • शिक्षा के माध्यम से लोगों को प्रभावित करना : एंथनी फ्रांसिस शर्मा की स्मार्ट ‘गॉस्पेल’ रणनीति

    शिक्षा के माध्यम से लोगों को प्रभावित करना : एंथनी फ्रांसिस शर्मा की स्मार्ट ‘गॉस्पेल’ रणनीति

    नेपाल के ऊंचे पहाड़ों में, जहां हिंदू धर्म को प्रभुत्व था और धर्म बदलना कानून के विरुद्ध था, एंथनी फ्रांसिस शर्मा ने स्कूलों का प्रयोग करके लोगों को चुपचाप क्राइस्ट के पास लाने का काम किया।

    12 दिसंबर, 1937 को गोरखा जिले के एक गरीब हिंदू परिवार में जन्म लेने वाला एंथनी फ्रांसिस शर्मा ने साबित किया हैं कि कैसे जेसुइट स्कूल गॉस्पेल शेयर (ईसाई धर्म का संदेश (गॉस्पेल) दूसरों तक पहुंचाना या बताना)। करने के गुप्त अस्त्र बन गए। उसने लोगों को सीख देकर अपनी ओर खींचा और विश्वास के सबक भी सिखाए। उसका जीवन हमें बताता है, शिक्षा, जीसस का मैसेज वहां भी फैला सकती है, जहां इस पर रोक है।

    और पढ़ें