“एक साम्राज्य जो न्याय के लिए खड़े होने का दावा करता है, वह मेहनती भारतीयों को केवल उनकी जाति की वजह से सम्मान देने से कैसे मना कर सकता है?”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
यह सवाल पूछने वाले व्यक्ति थे वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री, जो भारत के सबसे महान राजनयिकों और वक्ताओं में से एक थे। अंग्रेजी भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ ही विदेशों में भारतीयों के हक की रक्षा करने में उनका सबसे बड़ा हथियार बनी। 1927 में दक्षिण अफ़्रीका की संसद के सामने खड़े होकर, उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को ही चुनौती दी थी, गुस्से या धमकी से नहीं, बल्कि साम्राज्य के ही न्याय के आदर्शों के जरिए।
उस समय, दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे 1,50,000 से ज्यादा भारतीयों का भविष्य दांव पर लगा था। उनमें से कई लोग मजदूर के तौर पर समुद्र पार करके वहां पहुंचे थे, वहीं, कुछ लोगों ने लगातार कड़ी मेहनत करके सफल कारोबार खड़े किए थे। फिर भी, उनके इतने योगदान के बावजूद, उनके साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव किया जाता था।
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