1907 में, लंदन के प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में, लाला हरदयाल नामक एक मेधावी युवा भारतीय स्कॉलर एक कठिन मोड़ पर खड़े थे। अच्छे अंकों ने उन्हें ब्रिटिश सरकार में एक ऊंची सर्विस पक्की कर दी थी, जिसमें पैसा और सम्मान दोनों था।
परंतु उस युवा भारतीय स्कॉलर लाला हरदयाल ने एक चौंकाने वाला निर्णय लिया। उन्होंने अधिकारियों को एक विद्रोही स्वर वाली चिट्ठी लिखी, “ब्रिटिश शिक्षा हमें सेवक बना देती है। जब मेरी मातृभूमि जंजीरों में जकड़ी हुई है, तो यह स्कॉलरशिप मेरे लिए कांटों के मुकुट के समान है, मैं इसे छोड़ता हूं।” इस बड़ी अस्वीकृति ने भारतीय इतिहास को सदैव के लिए बदल दिया।
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