1951…, देश अभी-अभी आजदी की हवा में सांस लेना शुरू ही कर रहा था। लेकिन उस हवा में, बंटवारे के खून की महक अभी भी ताजा थी। अरब सागर के तट पर, सोमनाथ मंदिर अपनी खोई हुई शान वापस पा रहा था और हजार साल की गुलामी के जख्मों को भर रहा था। यह एक ऐसा पल था जब एक राष्ट्र अपनी खोई हुई आत्मा को फिर से हासिल कर रहा था।
हालांकि, ठीक उसी समय, दिल्ली की गद्दी पर बैठे बुद्धिजीवियों को यह ‘सांप्रदायिकता’ जैसा लगा। यहीं से यह सब शुरू हुआ, भारतीयता और बाहर से आई ‘धर्मनिरपेक्षता’ के बीच असली जंग!
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