22 जुलाई, 1908, रात 9:20 बजे। बॉम्बे हाईकोर्ट में ब्रिटिश जज दिनाशा डावर अपना फैसला सुना रहे हैं। वह राजद्रोह के आरोप में बाल गंगाधर तिलक को ‘छह साल के देश-निकाले’ की सजा सुनाते हुए बर्मा की मांडले जेल भेज रहे हैं।
ठीक उसी समय, जब तिलक को हथकड़ियां पहनाई जा रही थीं, उन्होंने कहा, “अगर ईश्वर को लगता है कि इस जेल की चारदीवारी के भीतर मेरा कष्ट सहना, बाहर आजाद रहने की तुलना में मेरे देश के लिए ज़्यादा हितकारी होगा, तो मैं इस सजा को सहर्ष स्वीकार करता हूं।”
लेकिन उन हथकड़ियों की खनक भारत से पहले लंदन की सड़कों पर गूंजी। वहां, पच्चीस साल के एक नौजवान विनायक दामोदर सावरकर की आंखों में खून उतर आया।
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