Tag: Veer Savarkar

  • कलम या पिस्तौल? तिलक की लौ ने सावरकर की क्रांतिकारी आग को कैसे भड़काया?

    कलम या पिस्तौल? तिलक की लौ ने सावरकर की क्रांतिकारी आग को कैसे भड़काया?

    22 जुलाई, 1908, रात 9:20 बजे। बॉम्बे हाईकोर्ट में ब्रिटिश जज दिनाशा डावर अपना फैसला सुना रहे हैं। वह राजद्रोह के आरोप में बाल गंगाधर तिलक को ‘छह साल के देश-निकाले’ की सजा सुनाते हुए बर्मा की मांडले जेल भेज रहे हैं। 

    ठीक उसी समय, जब तिलक को हथकड़ियां पहनाई जा रही थीं, उन्होंने कहा, “अगर ईश्वर को लगता है कि इस जेल की चारदीवारी के भीतर मेरा कष्ट सहना, बाहर आजाद रहने की तुलना में मेरे देश के लिए ज़्यादा हितकारी होगा, तो मैं इस सजा को सहर्ष स्वीकार करता हूं।” 

    लेकिन उन हथकड़ियों की खनक भारत से पहले लंदन की सड़कों पर गूंजी। वहां, पच्चीस साल के एक नौजवान विनायक दामोदर सावरकर की आंखों में खून उतर आया।

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  •  एक किताब और हिल गया साम्राज्य : कैसे वीर सावरकर की 1857 वाली पुस्तक ब्रिटिश राज के लिए बन गई खतरा?

     एक किताब और हिल गया साम्राज्य : कैसे वीर सावरकर की 1857 वाली पुस्तक ब्रिटिश राज के लिए बन गई खतरा?

    इतिहास में कई ऐसी किताबें हुई हैं, जिन्होंने सरकारों को असहज कर दिया था। लेकिन एक किताब ऐसी भी थी जिसे छपने से पहले ही खतरनाक घोषित कर दिया गया। यह किताब लिखी गई थी, विनायक दामोदर वीर सावरकर (28 मई 1883- 26 फरवरी 1966) द्वारा। उन्हें वीर सावरकर या स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी, विचारक, लेखक, कवि और हिंदुत्व विचारधारा के प्रणेता थे। 

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  • पतित पावन मंदिर: कैसे सावरकर ने ब्रिटिश कैद में भी सामाजिक क्रांति की शुरुआत की?

    पतित पावन मंदिर: कैसे सावरकर ने ब्रिटिश कैद में भी सामाजिक क्रांति की शुरुआत की?

    Patitpavan Temple and Veer Savarkar: 1924 के बाद रत्नागिरी में बिताया गया समय सावरकर के जीवन में एक अहम मोड़ साबित हुआ। अंडमान में कड़ी सजा के बाद, अंग्रेजों ने उन्हें रत्नागिरी में नजरबंद कर दिया था। हालांकि उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से मना किया गया था, लेकिन समाज को संगठित करने की उनकी कोशिशें बंद नहीं हुईं।

     उस दौरान, सावरकर ने समुदाय के अंदर बिखराव और बातचीत की कमी को करीब से देखा। इसलिए, समाज को मजबूत बनाने के मकसद से, उन्होंने ‘पतित पावन मंदिर’ बनाने का आइडिया दिया, जो जाति के भेदभाव के बिना सभी के लिए खुला होगा। इस आर्टिकल में, हम उस मंदिर की स्थापना के इतिहास और उसके पीछे की सामाजिक सोच के बारे में जानेंगे।

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