एक किताब और हिल गया साम्राज्य : कैसे वीर सावरकर की 1857 वाली पुस्तक ब्रिटिश राज के लिए बन गई खतरा?

Veer Savarkar

Written by

in

इतिहास में कई ऐसी किताबें हुई हैं, जिन्होंने सरकारों को असहज कर दिया था। लेकिन एक किताब ऐसी भी थी जिसे छपने से पहले ही खतरनाक घोषित कर दिया गया। यह किताब लिखी गई थी, विनायक दामोदर वीर सावरकर (28 मई 1883- 26 फरवरी 1966) द्वारा। उन्हें वीर सावरकर या स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी, विचारक, लेखक, कवि और हिंदुत्व विचारधारा के प्रणेता थे। 

विनायक दामोदर वीर सावरकर द्वारा लिखी गई किताब का नाम था, ‘The Indian War of Independence: 1857’ (1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर)। ब्रिटिश सरकार को डर था कि यदि यह पुस्तक लोगों तक पहुंच गई तो भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की चिंगारी और भड़क उठेगी। इसलिए ब्रिटिसर्स ने इसे प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। 

लेकिन सवाल यह है कि आखिर एक किताब इतनी खतरनाक कैसे बन गई कि ब्रिटिश साम्राज्य उससे डरने लगा? यह कहानी केवल एक पुस्तक की नहीं, बल्कि विचारों की उस ताकत की है, जो साम्राज्यवादी शासन को चुनौती दे सकती थी। इस लेख में हम चरण-दर-चरण समझेंगे कि वीर वीर सावरकर ने यह पुस्तक कैसे लिखी, ब्रिटिश सरकार इससे क्यों घबरा गई और आखिर यह पुस्तक क्रांतिकारियों तक कैसे पहुंची? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब।

इस कहानी की शुरुआत 1906 में होती है, जब वीर वीर सावरकर कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां वे लंदन के प्रसिद्ध क्रांतिकारी केंद्र इंडिया हाउस (India House) से जुड़े। यह स्थान उस समय भारतीय छात्रों और राष्ट्रवादी विचारकों का केंद्र बन चुका था। यहाँ बैठकर भारतीय स्वतंत्रता के भविष्य पर चर्चा होती थी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ रणनीतियाँ बनाई जाती थीं। इसी वातावरण में वीर सावरकर ने 1857 के विद्रोह का गहराई से अध्ययन आरम्भ किया। उस समय ब्रिटिश इतिहासकार 1857 को ‘सिपाही विद्रोह’ (Sepoy Mutiny) कहकर सीमित कर देते थे, लेकिन वीर सावरकर का मानना था कि यह एक व्यापक राष्ट्रीय क्रांति थी। उन्होंने ब्रिटिश अभिलेखागार, सैनिक रिपोर्टों और ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि 1857 में सैनिकों के साथ-साथ किसान, राजा और आम जनता भी अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी।

इस अध्ययन के बाद वीर सावरकर ने 1908 के आसपास इस विषय पर एक पुस्तक लिखना शुरू किया। फिर इसका पहला सीक्रेट संस्करण 10 मई 1909 को लंदन में अंग्रेजी भाषा में छापा गया, जिसका नाम रखा गया ‘The Indian War of Independence of 1857’। इसमें राइटर के नाम के स्थान पर ‘An Indian Nationalist’ उल्लेख किया गया। भूमिका में वीर सावरकर ने स्पष्ट किया कि उनके शोध का आधार मुख्यतः इंडिया हाउस लाइब्रेरी तथा नेशनल म्यूजियम लाइब्रेरी के ब्रिटिश सरकारी अभिलेख और ब्रिटिश लेखकों की किताबें रहीं। इनमें ब्रिटिश पक्षपात साफ झलकता था, किंतु इन्हीं से उन्हें यह समझ आया कि अंग्रेजों द्वारा ‘सिपाही विद्रोह’ कही जाने वाली घटना वास्तव में एक सुनियोजित स्वाधीनता आंदोलन की अभिव्यक्ति थी।

बता दें कि इससे ठीक एक वर्ष पूर्व, 10 मई 1908 को 1857 के विद्रोह की पुण्यतिथि पर वीर सावरकर ने ‘O Martyrs’ नामक चार पन्नों का एक गुप्त पर्चा तैयार किया और उसे चुपके से बांटा। इस पर्चा में लिखा गया कि 10 मई, 1857 को शुरू हुआ युद्ध 10 मई, 1908 को समाप्त नहीं हुआ है, वह तब तक नहीं रुकेगा, जब तक उस लक्ष्य को पूरा करनेवाली कोई अगली 10 मई नहीं आएगी। 

इस तरह से वीर सावरकर ने उस व्याख्या पर प्रहार किया, जो 1857 को केवल सिपाहियों का विद्रोह बताती थी। ब्रिटिश खुफिया तंत्र को इतना तो ज्ञात था कि वीर सावरकर दो वर्ष से लाइब्रेरी में गहन अध्ययन में जुटे हैं। उधर, पुस्तक के मैनुस्क्रिप्ट (पाण्डुलिप) को जब्त करने, उसके छपने से रोकने के लिए हरसंभव रोकथाम के उपाय भारत और लंदन दोनों में शुरू हो गए। 6 नवंबर 1908 से 23 जुलाई 1909 तक पूरे नौ महीनों की कठोर मेहनत के बावजूद ब्रिटिश गुप्तचर और भारत सरकार किताब की भाषा, नाम, छपाई स्थल तथा लेखक के उल्लिखित नाम की सटीक जानकारी नहीं जुटा पाई। अंतत: प्रकाशन से पूर्व ही किताब पर बैन लगा दिया गया। ब्रिटिश प्रशासन ने इसे ‘राजद्रोही साहित्य’ माना और इसके प्रसार को रोकने के लिए कड़े आदेश जारी किए। लेकिन यहीं से इस कहानी का सबसे रोचक हिस्सा शुरू होता है, क्योंकि प्रतिबंध के बावजूद क्रांतिकारियों ने इस पुस्तक को दुनिया के सामने लाने का निर्णय कर लिया।

प्रतिबंध के बाद इस पुस्तक को गुप्त रूप से छापने की योजना बनाई गई। इतिहासकारों के अनुसार इसका पहला संस्करण यूरोप में, विशेष रूप से नीदरलैंड के एक गुप्त प्रेस में छापा गया। इसके बाद क्रांतिकारी नेटवर्क के माध्यम से इसे भारत भेजा गया। कई बार इसे अन्य पुस्तकों के कवर में छिपाकर भेजा जाता था, ताकि ब्रिटिश पुलिस को शक न हो। कुछ प्रतियों पर तो किसी दूसरी पुस्तक का नाम तक लिख दिया जाता था। धीरे-धीरे यह पुस्तक भारतीय क्रांतिकारियों के बीच फैलने लगी और एक प्रेरणादायक दस्तावेज बन गई। माना जाता है कि कई युवा क्रांतिकारियों ने इसे पढ़कर प्रेरणा प्राप्त की, जिनमें भगत सिंह  और सुभाष चन्द्र बोस जैसे नाम भी शामिल किए जाते हैं। इस तरह जिस पुस्तक को ब्रिटिश सरकार दबाना चाहती थी, वही पुस्तक स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा बन गई।

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद इस पुस्तक पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो गया और यह खुले रूप में प्रकाशित होने लगी। आज इतिहासकार मानते हैं कि वीर सावरकर की इस पुस्तक ने 1857 की घटनाओं को देखने का एक नया दृष्टिकोण दिया। इसने यह विचार लोकप्रिय बनाया कि 1857 केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था, बल्कि भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। 

इस कहानी से एक महत्वपूर्ण बात समझ में आती है कि विचारों की शक्ति अक्सर तलवार से भी अधिक प्रभावशाली होती है। एक किताब, जिसे ब्रिटिश सरकार ने छपने से पहले ही खतरनाक मान लिया था, अंततः भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रेरणा बन गई।