21 जुलाई 1984 : जब आतंकियों ने पानी को हथियार बनाकर तोड़ी देश की लाइफलाइन, तब भारतीय सेना ने कैसे दी उनके इरादों को मात?

भाखड़ा मुख्य नहर

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भाखड़ा मुख्य नहर (BML) के बुदकी साइफन को उड़ाने की यह साजिश कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि यह अलगाववादी चरमपंथियों द्वारा बेहद ठंडे दिमाग से तैयार किया गया एक बड़ा रणनीतिक हमला (Strategic Strike) था। 

ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984) के बाद, जरनैल सिंह भिंडरावाले के मारे जाने और स्वर्ण मंदिर से चरमपंथियों के सफाए के बाद अलगाववादी नेतृत्व तितर-बितर हो चुका था। लेकिन पाकिस्तान में बैठे उनके आका और सीमा पार छिपे कुछ टॉप कमांडर भारत सरकार से बदला लेने के लिए छटपटा रहे थे। 

अलगाववादी संगठनों को यह समझ आ चुका था कि भारतीय सेना से सीधे मोर्चे पर जीतना लगभग असंभव है। इसलिए उन्होंने एक नई रणनीति चुनी, भारत की जीवन-रेखाओं पर हमला। रेल लाइनें, बिजली स्टेशन, संचार व्यवस्था और आखिरकार देश की सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई धमनियों में से एक-भाखड़ा मुख्य नहर। इसके पीछे मुख्य रूप से बब्बर खालसा इंटरनेशनल (BKI) और सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन (SSF) के बचे हुए उग्रवादियों का हाथ था। यह पूरी साजिश और घटना क्या थी, किसने इसे रचा, कौन था इसका मास्टरमाइंड और इसे कैसे अंजाम दिया गया, जानते हैं हमारी आज की इस कहानी से… 

1984 का साल था। पंजाब पहले ही उस दशक में तनाव, गोलियों और डर के साए में जी रहा था। ऑपरेशन ब्लू स्टार को सिर्फ डेढ़ महीना हुआ था। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सेना की कार्रवाई के बाद अलगाववादी संगठन बौखला चुके थे। पाकिस्तान की सीमा के पास और पंजाब के कुछ सुलगते हुए कोनों में छिपे ‘बब्बर खालसा इंटरनेशनल’ और ‘सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन’ के चरमपंथियों ने एक खुफिया बैठक की। उन्हें समझ आ गया था कि भारतीय सेना से सीधे युद्ध जीतना आसान नहीं है। इसलिए भारत अलगाववादी आतंकियों ने ‘रिसोर्स वॉरफेयर’ (संसाधनों पर हमला) का सहारा लिया जाए। उन्होंने भारत की “लाइफलाइन” पर हमला करने का फैसला किया। और इस काम में उनका मास्टरमाइंड था तलविंदर सिंह परमार

आतंकियों ने निशाना बनाया- भाखड़ा मुख्य नहर (BML) को। चरमपंथियों की टोली में कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे जो सिंचाई विभाग की बारीकियों को समझते थे। उन्होंने पंजाब के रोपड़ के पास ‘बुदकी नाले के साइफन’ को चुना। साइफन वह जगह होती है जहां नहर एक ऊंचे पुल की तरह नीचे बहने वाली बरसाती नदी के ऊपर से गुजरती है। साजिश यह थी कि अगर यहां ब्लास्ट किया गया, तो कंक्रीट का ढांचा ढह जाएगा और पानी नीचे की नदी में गिरकर बर्बाद हो जाएगा, जिससे उसे दोबारा बांधना नामुमकिन हो जाएगा।

उनका मकसद केवल नहर तोड़ना नहीं था।
असल योजना कहीं ज्यादा खतरनाक थी।

साजिश यह थी कि अगर यहां ब्लास्ट किया गया, तो कंक्रीट का ढांचा ढह जाएगा अगर भाखड़ा नहर लंबे समय तक बंद रहती, तो हरियाणा और राजस्थान में पानी का संकट पैदा हो जाता। आतंकियों को उम्मीद थी कि पानी रुकते ही राज्यों के बीच तनाव बढ़ेगा, किसान भड़क जाएंगे और देश के अंदर ही संघर्ष शुरू हो जाएगा। यह “रिसोर्स वॉरफेयर” यानी संसाधनों को हथियार बनाने की रणनीति थी।

जुलाई के शुरुआती हफ्तों में उग्रवादियों ने आम किसान बनकर उस जगह की रेकी की। स्थानीय कमान गुरबख्श सिंह नाम के उग्रवादी को सौंपी गई। चरमपंथियों ने देखा कि किस समय वहां सुरक्षा सबसे कम होती है और नहर के किस हिस्से पर विस्फोटक लगाने से सबसे ज्यादा नुकसान होगा। 

Image Source- Indian Express 

21 जुलाई 1984 की रात। जब इस घटना को अंजाम दिया गया। चारों तरफ कर्फ्यू का सन्नाटा था। अलगाववादियों ने रात के सन्नाटे और घने अंधेरे का फायदा उठाया। 4 से 5 हथियारबंद चरमपंथी कंक्रीट के साइफन पिलर्स के पास पहुंचे। उन्होंने कंक्रीट की दीवारों के भीतर बारूद फिट किया और टाइमर लगा दिया।

तड़के सुबह करीब 4 बजे, जब पूरा इलाका सो रहा था, एक गूंजते हुए धमाके ने रोपड़ की धरती को हिला दिया।  धमाका इतना शक्तिशाली था कि कंक्रीट का वह मजबूत ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह गया। नहर की दीवार में 200 फीट चौड़ी और 30 फीट गहरी दरार (Breach) आ गई। 12,000 क्यूसेक की रफ्तार से बह रहा पानी आसपास के खेतों और गांवों में घुसने लगा। 

अधिकारियों के अनुसार भाखड़ा नहर के किनारे बने 2,000 फुट लंबे दरार के कारण 500,000 की आबादी वाले शहर चंडीगढ़ में पानी का प्रवाह 50 प्रतिशत की कम हो गई थी।  महज तीन दिनों के भीतर हरियाणा के सिरसा, हिसार और राजस्थान के श्रीगंगानगर में हाहाकार मच गया। धान और कपास की फसलें खराब हो गईं। 

अगर यह नहर लंबे समय तक बंद रहती तो हरियाणा और राजस्थान के खेत सूखने लगते, पंजाब के कई इलाके बाढ़ की चपेट में आ सकते थे, जबकि हरियाणा और राजस्थान में पानी का संकट और गहरा जाता। इससे राज्यों के बीच गुस्सा और टकराव पैदा हो सकता था। यही आतंकियों का असली मकसद था, भारत को अंदर से तोड़ना। 

अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि लाखों एकड़ में बोई गई फसलों को लगभग 50 मिलियन डॉलर (करीब 40 करोड़ रुपये से ज्यादा, उस समय के हिसाब से) का नुकसान हो सकता था। 

गांवों में अफवाहें फैल रही थीं, “पंजाब ने पानी रोक दिया।” कुछ जगह माहौल गर्म होने लगा। अलगाववादियों को उम्मीद थी कि हरियाणा के किसान पंजाब के खिलाफ सड़कों पर उतर आएंगे। उस समय भाखड़ा मुख्य नहर केवल पंजाब की नहर नहीं थी। यह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और चंडीगढ़ के लाखों लोगों की जीवनरेखा थी। इसी नहर के जरिए हजारों गांवों तक पीने का पानी पहुंचता था और लाखों एकड़ खेतों की सिंचाई होती थी।

लेकिन लोगों ने संयम से काम लिया। लेकिन असली चुनौती थी-नहर को दोबारा जोड़ना। नहर टूटने की खबर बिजली की तरह दिल्ली तक पहुंच गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह एक नेशनल इमरजेंसी थी।

शुरुआती 48 घंटों तक मरम्मत का काम लगभग ठप रहा, क्योंकि स्थानीय प्रशासन पूरी तरह पंगु हो चुका था। संकट की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार के हाथ पैर फूल  गए। नहर की मरम्मत का काम भारतीय सेना की इंजीनियरिंग कोर (Bombay and Bengal Sappers) और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) के शीर्ष इंजीनियरों को सौंपा गया। 

सेना ने मरम्मत का मोर्चा संभाला और इसे युद्धस्तर का मिशन बना दिया। यह कोई साधारण मरम्मत नहीं थी। नहर का बहाव बहुत तेज था। मिट्टी दलदल बन चुकी थी। भारी मशीनें कीचड़ में धंस रही थीं। हर समय दूसरे हमले का खतरा था। सैनिकों और इंजीनियरों को कमर तक पानी में उतरकर काम करना पड़ रहा था। फिर भी भारतीय सेना पीछे नहीं हटी। रातभर फ्लडलाइट्स के नीचे काम चलता रहा। हजारों रेत की बोरियां डाली गईं। विशेष मशीनें मंगाई गईं।  रेलवे के जरिए जरूरी सामान पहुंचाया गया। 

Image Source- sansad

सेना के जवानों और BBMB इंजीनियरों ने 48 से 72 घंटे तक लगातार मरम्मत का काम भूखे-प्यासे रहकर पूरा किया। पंजाब के गांवों में लोगों ने सेना और मजदूरों के लिए लंगर लगाए। कुछ ही दिनों में सेना और BBMB इंजीनियरों ने टूटे हिस्से को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। धीरे-धीरे पानी की सप्लाई फिर शुरू हुई। चंडीगढ़, हरियाणा और राजस्थान ने राहत की सांस ली।

हरियाणा के किसानों ने संयम रखा। राजस्थान के लोगों ने पानी बांटा। और भारतीय सेना ने साबित कर दिया कि वह केवल सीमा पर देश की रक्षा नहीं करती, बल्कि देश की जीवनरेखाओं को भी बचाती है। उस समय जब अलगाववादी नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे थे, भारतीय सेना ‘एक भारत’ की सबसे मजबूत तस्वीर बन चुकी थी। अलगाववादियों ने सोचा था कि भाखड़ा नहर का यह हमला भारत को बांट देगा। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा।

1984 में टूटी भाखड़ा मुख्य नहर आज भी उस भारत की कहानी है, जहां संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, लोग टूटते नहीं। और जब भारतीय सेना और देश के लोग एकजुट हो जाएं तो औसे भारत को बांटने वाले लोगों के हौसले पस्त हो जाते हैं। 

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