1909 का अपमान, 1911 का खून! मतमुर जामोह की सनसनीखेज बदले वाली कहानी

Adi Janjatiy

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उत्तर-पूर्व भारत की घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों में स्वतंत्रता संग्राम की कई अनकही कहानियां छिपी हुई हैं। इनमें से एक सबसे प्रेरणादायक और मार्मिक कहानी है अरुणाचल प्रदेश के आदि जनजाति (Adi Janjatiy) के योद्धा और स्वतंत्रता सेनानी मतमुर जामोह की। वे सियांग (Siang) घाटी स्थित केमी-टोलोन गांव (वर्तमान में यागरुंग गांव) के गांव प्रमुख थे। उनकी कहानी सिर्फ व्यक्तिगत बदले की नहीं, बल्कि जनजातीय समुदाय के स्वाभिमान, जमीन और संस्कृति की रक्षा की लड़ाई की मिसाल है।

1909 का वर्ष था। ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार असम से आगे अरुणाचल की घाटियों में फैल रहा था। ब्रिटिश अधिकारी नोएल विलियमसन अरुणाचल से सटे असम के सदिया का असिस्टेंट पॉलिटिकल ऑफिसर था। वह अपनी टीम के साथ अरुणाचल की सियांग घाटी में घुसा। इस दौरान विलियमसन ने केमी-टोलोन गांव में रुकने का फैसला किया। उसने गांव के प्रमुख मतमुर जामोह को संदेश भेजा कि ठहरने, खाने-पीने और रहने की पूरी व्यवस्था की जाए।

मतमुर जामोह ने साफ मना कर दिया। जामोह ब्रिटिश हस्तक्षेप, गोरों लोगों के दखल और अपनी जनजाति की स्वतंत्रता पर पड़ने वाले प्रभाव से घृणा करते थे। उनके लिए अपने आदि जनजाति समाज की परंपरागत जीवनशैली और धार्मिक विश्वास सर्वोपरि था। वे नहीं चाहते थे कि अंग्रेज उनके किसी भी मामले में दखल करें। यह इनकार मात्र एक व्यक्ति का फैसला नहीं था, बल्कि आदि समुदाय की स्वतंत्रता की आवाज था।

विलियमसन को यह इनकार बहुत बड़ा अपमान लगा। उसने मतमुर जामोह को पूरे गांव वालों के सामने बुलाया और फिर उन्हें लाठियों से पीटा गया, अपमानजनक शब्द कहे गए। गांव प्रमुख का इस तरह सार्वजनिक अपमान पूरे समुदाय का अपमान था।

मतमुर जामोह ने चुपचाप यह घाव सह लिया, लेकिन उनके मन में बदले की आग सुलग गई। उन्होंने अंदर ही अंदर शपथ ले ली कि इस अपमान का जवाब जरूर दिया जाएगा।

अगले दो वर्षों तक मतमुर जामोह चुपचाप तैयारी करते रहे। उन्होंने आसपास के गांवों केबांग, कोमसिंग, पांगी, सिसेन, रोट्टुंग आदि के प्रमुखों से संपर्क बनाए रखा। गुप्त चर्चाएं हुईं। युवा योद्धाओं को तैयार किया गया और रणनीति बनाई गई।

दो साल बाद 20 मार्च 1911 को नोएल विलियमसन फिर से सियांग घाटी में अभियान पर था। इस बार उसके साथ डॉ. ग्रीगोरसन (चिकित्सा अधिकारी) और एक बड़ा दल था। इस पूरे दल को सियांग घाटी में स्थित कोम्सिंग गांव में कई दिनों तक रुककर पूरे इलाके में आदि जनजाति समुदाय पर लगाम कसना था। लेकिन सिसेन गांव के पास दल का सामान ढोने वाले अधिकांश कुली बीमार पड़ गए, जिसके कारण डॉ. ग्रेगोर्सन को वहीं रुकना पड़ा जबकि विलियमसन कोम्सिंग गांव के लिए आगे बढ़ गया।

जामोह को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने पहले से तैयार किए आदि युवा योद्धाओं को इकट्ठा किया और ब्रिटिश अभियान दल पर हमला करने की योजना बनाई गई। योजना के तहत दो ग्रुप बनाए गए, जिसमें एक ग्रुप को कोम्सिंग गांव में विलियमसन के साथ ठहरे दल पर अटैक करना था, जिसका नेतृत्व जामोह के पास था। जबकि दूसरे ग्रुप को सिसेन में डॉ. ग्रीगोरसन के साथ रुके दल पर हमला करना था। 

31 मार्च, 1911 को कोमसिंग में जामोह के नेतृत्व वाले ग्रुप ने हमला किया और जामोह ने विलियमसन को विशेष तलवार आदि दाओ  से मार गिराया। उसी दिन सिसेन में डॉ. ग्रेगोर्सन के शिविर पर हमला किया और वह, अपने अंगरक्षकों के साथ मारा गया।

विलियमसन के मरने के बाद चौथा एंग्लो-अबोर युद्ध आरम्भ हुआ। यह युद्ध 6 अक्टूबर 1911 से 11 जनवरी 1912 तक चला। मेजर जनरल हैमिल्टन बोवर के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना और मतमुर जामोह के नेतृत्व वाली आदि योद्धाओं के बीच हुआ। ब्रिटिश सेना ने वहां के गांवों को आग के हवाले कर दिया और फसलें नष्ट कर दीं। मतमुर जामोह की पत्नी, बेटे और आदि जनजातीय समाज के तमाम लोगों को यातनाएं दी गई। अपने परिवार और समुदाय को और अधिक यातना से बचाने के लिए मतमुर जामोह ने सरेंडर कर दिया। उन्हें सेल्युलर जेल (कालापानी, अंडमान) भेज दिया गया, इसके बाद उनका कोई आगे का रिकॉर्ड नहीं मिलता। वे अनसंग हीरो बनकर रह गए।

मतमुर जामोह की कहानी केवल अपमान और बदले की नहीं, बल्कि स्वाभिमान की जीत की अमर गाथा है। एक साधारण गांव के प्रमुख ने साबित कर दिया कि जब कोई व्यक्ति अपने सम्मान, जमीन और संस्कृति के लिए डटकर खड़ा होता है, तो वह इतिहास रच सकता है। जामोह की कहानी याद दिलाती है कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई सिर्फ मैदान में ही नहीं, अरुणाचल की पहाड़ियों में भी लड़ी गई थी।