24 अप्रैल 1993 की वह रात भारत के सुरक्षा इतिहास की सबसे भयानक रातों में से एक थी। अमृतसर एयरपोर्ट के रनवे पर खड़े इंडियन एयरलाइंस के बोइंग 737 विमान में 141 लोगों की जिंदगी कैद थी। जिसे पाकिस्तानी आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के एक आतंकी द्वारा हाईजैक किया गया था। जिसकी उंगलियां ट्रिगर पर थीं और जुबान पर धमकी। जिसमें स्पष्ट था कि अगर उसकी मांगे न मानी गईं तो वह पूरे विमान को बम से उड़ा देगा।
पूरे देश की नजरें इस संकट पर टिकी थीं। हर बीतते मिनट के साथ खतरा बढ़ता जा रहा था। इसी भय के वातावरण में एक ऐसा सैन्य अधिकारी ने एक ऐसी रणनीति तैयार की, जिसने मात्र 12 सेंकेंड में ही इतिहास रच दिया। वह थे, एनएसजी के काउंटर हाईजैक फोर्स के कमांडर ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा। जिन्होंने ऑपरेशन अश्वमेध चलाकर 141 लोगों की जान बचाई।
24 अप्रैल 1993, दोपहर 1:57 बजे, दिल्ली एयरपोर्ट से इंडियन एयरलाइंस की बोइंग 737 फ्लाइट श्रीनगर के लिए उड़ान भरी। यात्रियों के बीच एक दिव्यांग व्यक्ति भी बैठा था, जिसने अपनी पहचान एचएम रिजवी बताई थी। जिसके पैरों पर प्लास्टर चढ़ा था। असल में वह दिव्यांग व्यक्ति हिजबुल मुजाहिदीन का टॉप कमांडर आतंकी मोहम्मद यूसुफ था।
लेकिन उड़ान भरने के मात्र 30 मिनट बाद ही खुशनुमा माहौल दहशत में बदल गया। उस आतंकी ने अचानक अपने प्लास्टर में छिपाई दो 9 एमएम पिस्तौलें निकाल लीं और विमान को काबुल ले जाने का दबाव बनाने लगा और दावा किया कि उसके पास बम भी है। पहले वह बलपूर्वक विमान को लाहौर ले गया। पर लाहौर एयर ट्रैफिक कंट्रोल ने विमान को पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद विमान लाहौर के ऊपर चक्कर लगाने के बाद वापस भारत लौट आया। अंततः विमान शाम 3:20 बजे अमृतसर में उतरा। वहां अपहरणकर्ता ने पूरे क्रू और यात्रियों को बंधक बनाए रखा और विमान में ईंधन भरने की मांग की, ताकि वह काबुल जा सके।
यहां स्थिति और खतरनाक हो गई। हाईजैकर ने चेतावनी के तौर पर विमान के भीतर गोली भी चलाई। स्थानीय पुलिस प्रशासन ने उससे बात करते हुए समाधान निकालने का प्रयास किया लेकिन वे असफल हुए। तब भारत सरकार ने यात्रियों को बचाने के लिए ऑपरेशन अश्वमेध चलाया, जिसकी कमान ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा को सौंपी गई। वह उस समय एनएसजी के काउंटर हाइजैक टास्क फोर्स के कमांडर थे।
ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा स्थिति का आकलन करते हुए यह समझ गए थे कि यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि सेकंड-सेकंड पर टिकी जिंदगी और मौत की लड़ाई है। उनका पहला लक्ष्य था, आतंकवादी को सतर्क होने से रोकना और दूसरा लक्ष्य था, एक भी यात्री को नुकसान पहुंचे बिना ऑपरेशन को अंजाम देना।
ब्रिगेडियर मिश्रा ने अपनी रणनीति बेहद धैर्य और सटीकता के साथ बनाई। उन्होंने समझ लिया था कि यदि सुबह होने लगी, तो विमान के भीतर बैठा हाईजैकर कमांडो की हलचल देख लेगा और फिर यात्रियों पर फायरिंग भी कर सकता है। इसलिए उन्होंने रात के अंधेरे को अपना हथियार बना लिया।
ब्रिगेडियर मिश्रा के कहने पर पंजाब पुलिस प्रमुख केपीएस गिल लगातार रेडियो फोन पर हाईजैकर से उसकी मांगों को लेकर बातचीत कर रहे थे। ताकि उसका ध्यान भटकाया जा सके। इसी बीच ब्रिगेडियर मिश्रा ने एनएसजी कमांडो को विमान के हर प्रवेश बिंदु का नक्शा समझाया। साथ ही एयर होस्टेसों तक इशारों के माध्यम से संदेश पहुंचाया, जिससे उन्होंने अद्भुत साहस दिखाते हुए विमान के दरवाजों के व्हील लॉक को खोल दिए। ब्रिगेडियर मिश्रा ने इस पूरे घटनाक्रम को इतनी गोपनीयता से अंजाम दिया कि हाईजैकर को भनक तक नहीं लगी।
25 अप्रैल की रात ठीक 1 बजे ब्रिगेडियर मिश्रा ने अंतिम आदेश दिया। एनएसजी के 60 ब्लैक कैट कमांडो सात अलग-अलग दिशाओं से एक साथ विमान में प्रवेश हुए। ऑपरेशन की सबसे बड़ी ताकत उसका अचानक किया गया हमला था। हाईजैकर को प्रतिक्रिया दिखाने का मौका ही नहीं मिला। जैसे ही आतंकी ने फायरिंग करने का प्रयास किया, एनएसजी कमांडो उस पर टूट पड़े। साइलेंसर लगे पिस्टलों से नियंत्रित फायरिंग हुई और मात्र 12 सेकंड में आतंकी को हिरासत में ले लिया गया। ब्रिगेडियर मिश्रा ने अपनी रणनीति से ऑपरेशन को इतनी सटीकता से सफल किया की किसी यात्री को खरोंच तक नहीं आई।
ऑपरेशन अश्वमेध की सबसे बड़ी सफलता सिर्फ हाईजैकर को मार गिराना नहीं थी, बल्कि 141 यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालना था। यह उस रणनीति की जीत थी, जिसमें जल्दबाजी नहीं बल्कि धैर्य, मनोवैज्ञानिक दबाव और सही समय पर हमला शामिल था।
ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा जानते थे कि ऐसी परिस्थितियों में एक छोटी सी गलती भी सैकड़ों जिंदगियां खत्म कर सकती है। इसलिए उन्होंने हर कदम बेहद सोच-समझकर उठाया। उन्होंने अपनी टीम को केवल गोली चलाने के लिए नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के लिए तैयार किया था। यही वजह रही कि ऑपरेशन अश्वमेध दुनिया के सबसे सफल काउंटर-हाइजैक अभियानों में गिना गया।
जन्म और व्यक्तिगत जीवन
ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा (बाल दत्त मिश्रा) का जन्म 20 जुलाई 1939 को उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के कठौता गांव में हुआ था। मिश्रा ने 11 दिसंबर, 1961 को भारतीय थल सेना में की मद्रास रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ था। 34 वर्षों तक सेना में कार्य करते हुए 31 जुलाई 1995 को वह सेवानिवृत्त हुए। उसके कुशल नेतृत्व प्रबंधन को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 3 अक्टूबर 2017 को अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया था।

