इतिहास में कई ऐसी किताबें हुई हैं, जिन्होंने सरकारों को असहज कर दिया था। लेकिन एक किताब ऐसी भी थी जिसे छपने से पहले ही खतरनाक घोषित कर दिया गया। यह किताब लिखी गई थी, विनायक दामोदर वीर सावरकर (28 मई 1883- 26 फरवरी 1966) द्वारा। उन्हें वीर सावरकर या स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी, विचारक, लेखक, कवि और हिंदुत्व विचारधारा के प्रणेता थे।
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जूहू का ‘मड फ्लैट’ थ्रिलर: जे आर डी टाटा ने चांद के जरिए ब्रिटिश राज के घमंड को कैसे जमीन पर ला दिया
1920 के दशक में, भारत में एविएशन पर ज्यादातर ब्रिटिश लोगों का कंट्रोल था। भारतीय आसमान पर ब्रिटिश लोगों के इस एकाधिकार के बीच, एक नौजवान, जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, यानी जे.ऐर.डी. टाटा एक पायलट लाइसेंस और अपनी खुद की एयरलाइन बनाने के एक बड़े सपने के साथ आगे आया। उन्होंने उस सपने को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास किया, 1927 से 1929 के बीच ट्रेनिंग ली और 1929 में, वह भारत का पहला लाइसेंस्ड पायलट बन गए। हालांकि, उन्हें अपने ही ‘टाटा संस’ बोर्ड के अंदर विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन जे.आर.डी. टाटा पीछे नहीं हटे। आखिरकार, टाटा संस बोर्ड मान गया।
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ब्रिटिश राज के समुद्री मिथक की फैक्ट चेकिंग : कैसे भारतीय समुद्री एक्सपर्टीज ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को पावर दी
पीढ़ियों तक, अंग्रेज, जिन्होंने लगभग 200 सालों तक भारत पर कब्जा कर के रखा, हमें बहुत भरोसे के साथ एक झूठी कहानी सुनाते रहे कि यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ही थी, जो भारतीय जल क्षेत्र में व्यवस्था, सुरक्षा और मॉडर्न शिपिंग लाई। उनके नैरेटिव के अनुसार, अंग्रेज ही थे, जिन्होंने समुद्री रास्ते खोले, ‘पाइरेसी’ को दबाया, और एक डिसिप्लिन्ड समुद्री सिस्टम लाया।
फिर भी इस नैरेटिव के पीछे एक चौंकाने वाली सच्चाई छिपी है। जिन जहाजों ने ब्रिटिश दबदबे को मुमकिन बनाया, वे पानी में भारत की मौजूदा एक्सपर्टीज का नतीजा थे। उन्होंने जिन जहाजों का प्रयोग किया, वे ज्यादातर भारतीय सामग्री से, भारतीय डॉकयार्ड में और भारतीय जहाज बनाने वालों के लिए लंबे समय से जानी-पहचानी तकनीक से बनाए गए थे। कुल मिलाकर, जिस ब्रिटिश साम्राज्य ने समुद्र को सभ्य बनाने का दावा किया, वह उसी समुद्री दुनिया में भारतीय विशेषज्ञता पर बहुत ज्यादा निर्भर था, जिस पर वह दबदबा बनाना चाहता था।
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जब एक बम ने हिला दी थी ब्रिटिश सत्ता : रास बिहारी बोस की अनोखी क्रांतिकारी कहानी
दिल्ली के चांदनी चौक में एक बड़ा जुलूस निकला जा रहा था और अचानक एक जोरदार धमाका हुआ जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था।
यह 23 दिसंबर 1912 की घटना थी, जब वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। यह कहानी है महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रास बिहारी बोस की, जो इस योजना के सूत्रधार थे। आइए जानते हैं कि यह सब कैसे आरम्भ हुआ, कैसे एक क्रांतिकारी ने ब्रिटिश सत्ता को हिलाकर रख दिया था।
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