जब एक बम ने हिला दी थी ब्रिटिश सत्ता : रास बिहारी बोस की अनोखी क्रांतिकारी कहानी

दिल्ली के चांदनी चौक में एक बड़ा जुलूस निकला जा रहा था और अचानक एक जोरदार धमाका हुआ जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था।

यह 23 दिसंबर 1912 की घटना थी, जब वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। यह कहानी है महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रास बिहारी बोस की, जो इस योजना के सूत्रधार थे। आइए जानते हैं कि यह सब कैसे आरम्भ हुआ, कैसे एक क्रांतिकारी ने ब्रिटिश सत्ता को हिलाकर रख दिया था। 

क्रांतिकारी गुस्से से जन्मी योजना

रास बिहारी बोस का जन्म 1886 में बंगाल में हुआ था, जहां वह ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों से जल्दी ही प्रभावित हो गए। 1911 में जब ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता से भारत की राजधानी दिल्ली स्थानांतरित की, तो इससे क्रांतिकारियों में गहरा असंतोष फैल गया। 

दिल्ली दरबार के भव्य आयोजन में सरकारी पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा था, जबकि देशवासी गरीबी में जी रहे थे। रास बिहारी, जो अनुशीलन समिति जैसे गुप्त संगठनों से जुड़े थे, ने इस फिजूलखर्ची को ब्रिटिश लूट का प्रतीक माना। उन्होंने फैसला किया कि वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग को निशाना बनाकर अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इस योजना की शुरुआत बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हुई, जहां रास बिहारी ने नेतृत्व संभाला और बम बनाने की तैयारी शुरू की।

गोपनीय तैयारी और हमले की रणनीति

योजना को गोपनीय रखते हुए रास बिहारी ने अपने युवा साथी बसंता कुमार बिस्वास को मुख्य भूमिका सौंपी। बसंता एक साहसी क्रांतिकारी थे, जो महिला वेश में घुसपैठ करने में चतुर थे। 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग का जुलूस निकलने वाला था, जो राजधानी के बदलाव के उत्सव का हिस्सा था। 

रास बिहारी ने तय किया कि चांदनी चौक में, जहां भीड़ सबसे अधिक होगी, वहां हमला किया जाएगा। उन्होंने बम को घरेलू सामग्री से बनवाया, ताकि किसी को भनक तक न चल सके। बसंता को निर्देश दिया गया कि वह महिलाओं की भीड़ में छिपें और सही मौके पर बम फेंकें। यह पूरी की पूरी तैयारी गुप्त थी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को इसकी जरा भी भनक तक नहीं लगी।

जुलूस का दिन और गुप्त तैयारी

जुलूस के दिन चांदनी चौक में उत्साह का माहौल था। लॉर्ड हार्डिंग और उनकी पत्नी लेडी हार्डिंग एक सजे हुए हाथी पर सवार थे, साथ में महावत और अंगरक्षक। जुलूस में घोड़े, सैनिक और ढोल-नगाड़े शामिल थे, जो ब्रिटिश शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। बसंता कुमार बिस्वास, एक इमारत से जुलूस देख रही महिलाओं के बीच महिला वेश में छिपे हुए थे। जैसे ही हाथी नजदीक आया, बसंता ने उसपर बम फेंका। रास बिहारी दूर से इस सब को नियंत्रित कर रहे थे, सुनिश्चित करते हुए कि योजना सही ढंग से चले। 

धमाके का भयानक पल और ब्रिटिश राज में हड़कंप

बम फेंके जाने के साथ ही चांदनी चौक में भयानक धमाका हुआ। धुआं चारों तरफ फैल गया, और अफरा-तफरी मच गई। लॉर्ड हार्डिंग बेहोश होकर हाथी से गिर पड़े। उनके पीठ, पैर और सिर में छर्रे लगे, लेकिन वह मौत से बच गए। महावत की जान चली गई, जबकि हाथी का हौदा (हाथी की पीठ पर रखा जाने वाला एक आसन या गाड़ी, जिसमें बैठकर धनी लोग, राजा-महाराजा यात्रा करते थे) टुकड़ों में बिखर गया। जुलूस तितर-बितर हो गया, और लोग चीखते हुए भागने लगे। 

बसंता और उनके साथी भीड़ का फायदा उठाकर भाग निकले। रास बिहारी की यह योजना सबसे रोमांचक हिस्सा थी, क्योंकि इससे ब्रिटिश सरकार हिल गई और क्रांतिकारियों में नई ऊर्जा आई। यह विस्फोट न केवल शारीरिक था, बल्कि ब्रिटिश राज की नींव को झकझोरने वाला था। बाद में इस केस में बसंता कुमार बिस्वास समेत 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया और फांसी की सजा दी गई। 

जापान जाकर चलाया स्वतंत्रता के लिए अभियान

परंतु रास बिहारी कर ब्रिटिश सरकार नहीं पहुंच पाई। इस घटना के बाद रास बिहारी पुलिस से बचते हुए जापान चले गए, जहां उन्होंने वर्ष 1942 में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भारत के बाहर रहने वाले भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए एकजुट करना था। 25 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान में जन्मे रास बिहारी बोस ने 21 जनवरी 1945 को 59 वर्ष की उम्र में टोक्यो में अंतिम सांस ली।

रास बिहारी बोस की यह कहानी आज हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में व्यक्तिगत बलिदान कितना महत्वपूर्ण होता है। यह प्रयास साहस और बुद्धिमत्ता की मिसाल है, जिसने ब्रिटिश शासन को चुनौती देकर स्वतंत्रता संग्राम में नई ऊर्जा भरी। उनका योगदान बताता है कि आजादी की लड़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती।