13 सितंबर 2008 की शाम दिल्ली सदमे में थी, शहर भर में हुए कई बम धमाकों में सैकड़ों लोग घायल हुए थे और दर्जनों लोगों की मौत हो गई थी। इन हमलों के ज़िम्मेदार लोगों की तलाश तुरंत शुरू हो गई और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस मिशन की कमान संभाली। इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा इस काम में सबसे आगे थे, इस केस से जुड़ने से बहुत पहले ही टेरर अटैक की जांच करने वाले के तौर पर उनकी अच्छी-खासी पहचान बन चुकी थी।
इसके बाद हुई जांच काफी जटिल थी, पुलिस ने धमाके वाली जगहों से मिले सबूतों की छानबीन की, फोन रिकॉर्ड और मैसेज खंगाले, और हर उस सुराग को चेक किया, जिससे ज़िम्मेदार लोगों की पहचान हो सके। इसी प्रक्रिया के दौरान पुलिस को यह शक हुआ कि ‘इंडियन मुजाहिदीन’ नाम के आतंकवादी संगठन के सदस्य जामिया नगर के बाटला हाउस स्थित फ्लैट L-18 में छिपे हुए हैं।
उन्हें डर था कि आतंकी हमलों के लिए जिम्मेदार लोग इन इमारतों का इस्तेमाल अपने ऑपरेशन के बेस के तौर पर कर रहे थे और अगर पुलिस साफ तौर पर वहां मौजूद होती, तो वे इलाका छोड़कर भागने की कोशिश करते, जिससे आसपास मौजूद बेगुनाह लोग घायल हो सकते थे या मारे जा सकते थे।
आतंकवादियों को पुलिस की मौजूदगी का पता न चले, इसलिए दिल्ली पुलिस के अधिकारियों की एक छोटी टीम को उस इमारत में भेजा गया ताकि वे अपार्टमेंट में घुसकर अंदर मौजूद लोगों को पकड़ सकें। इंस्पेक्टर शर्मा ने खुद टीम के साथ जाने का फैसला किया और सादे कपड़ों में सात अधिकारियों की उस यूनिट की अगुवाई करते हुए 19 सितंबर 2008 की सुबह अपार्टमेंट की सीढ़ियां चढ़े।
पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, जैसे ही इंस्पेक्टर शर्मा और उनकी टीम अपार्टमेंट में दाखिल हुई, उन पर तुरंत गोलियां चलाई गईं। आतंकवादियों ने तंग जगह पर मोर्चा संभाल रखा था और उन्होंने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें इंस्पेक्टर शर्मा घायल हो गए। उन्होंने जवाबी फायरिंग की और अपनी टीम को अपार्टमेंट के अंदर जाने के लिए कवर दिया, जिसके बाद आमने-सामने की ज़बरदस्त मुठभेड़ हुई।
मुठभेड़ खत्म होने पर, इंडियन मुजाहिदीन के दो मुख्य आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद के शव अपार्टमेंट के फर्श पर मिले, पुलिस की जांच में उनकी मौत की पुष्टि हुई। पुलिस को मोहम्मद सैफ भी मिला, जो बुरी तरह घायल था और गिरफ्तार होने से पहले उसने हमलों में अपनी भूमिका कबूल की। हालांकि, आरिज खान और शहजाद अहमद नाम के अन्य आतंकवादी अपार्टमेंट से भागने और पुलिस की पकड़ से बचने में कामयाब रहे। इंस्पेक्टर शर्मा बुरी तरह घायल होने के बावजूद जिंदा थे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसी दिन जख्मों के कारण उनकी मौत हो गई। इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा ने देश की सुरक्षा के लिए चलाए गए एक आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशन के दौरान अपनी जान गंवा दी।
इसके बाद भी बाकी संदिग्धों की तलाश जारी रही। फरवरी 2010 में, उत्तर प्रदेश एंटी-टेररिज्म स्क्वाड ने आजमगढ़ से शहजाद अहमद को गिरफ्तार किया और 2013 में उसे इंस्पेक्टर शर्मा की हत्या और अन्य आरोपों में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई। हालांकि, जो व्यक्ति लगभग दस वर्षों तक फरार रहा, वह आरिज़ खान था। उसे फरवरी 2018 में भारत-नेपाल सीमा के पास गिरफ्तार किया गया। दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने 2021 में उसे दोषी ठहराया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने 2023 में उनकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।
अधिकारियों ने माना कि बाटला हाउस एनकाउंटर इंडियन मुजाहिदीन के लिए एक बड़ा झटका था। खुफिया एजेंसियों को अहम जानकारी मिली, जिससे उन्हें इस आतंकवादी संगठन को खत्म करने में मदद मिली। इसके बाद, भारत में कई संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया और उनसे जुड़े अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया।
इंस्पेक्टर शर्मा को उनकी भूमिका के लिए सराहा गया और उनकी बहादुरी व सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। यह शांति के समय वीरता के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है और देश के प्रति उनके समर्पण और सेवा के असाधारण कार्य को मान्यता देता है।
बाटला हाउस एनकाउंटर, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारतीय पुलिसकर्मियों द्वारा दिए गए बलिदानों की याद दिलाता है। देश में आतंकवाद से निपटने में इंस्पेक्टर शर्मा के साहसी कार्यों और नेतृत्व के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

