आज के दौर में किसी बड़े अभिनेता के निधन के बाद कुछ दिनों तक मीडिया और सोशल मीडिया पर उसकी चर्चा होती है, लोग श्रद्धांजलि देते हैं, पुरानी यादें साझा करते हैं और फिर समय के साथ सब सामान्य हो जाता है।
लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब टीवी के एक काल्पनिक किरदार की काल्पनिक बीमारी ने पूरे देश को बेचैन कर दिया था। लोग केवल दुखी ही नहीं हुए, बल्कि उस किरदार को बचाने के लिए निर्माताओं और लेखक को हजारों चिट्ठियां लिख डालीं। दूरदर्शन के दफ्तर में पत्रों का अंबार लग गया और हर पत्र में एक ही आग्रह था, “दादी को कहानी से मत हटाइए।”
यह किरदार था भारत के पहले लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘हम लोग’ की दादी इमरती देवी का, जिसे अभिनेत्री सुषमा सेठ ने अपने सशक्त अभिनय से इस तरह जीवंत बनाया कि वह करोड़ों भारतीयों के परिवार का हिस्सा बन गईं।
साल 1984 में दूरदर्शन पर प्रसारित ‘हम लोग’ भारतीय टेलीविजन का पहला ऐसा पारिवारिक धारावाहिक था, जिसमें आम मध्यम वर्गीय परिवार की खुशियां, संघर्ष और रिश्ते दिखाई देते थे। लेखक मनोहर श्याम जोशी और निर्देशक पी. कुमार वासुदेव ने हर किरदार को इतनी सादगी और वास्तविकता से लिखा कि दर्शकों को उनमें अपना घर दिखाई देता था। हर एपिसोड के अंत में सूत्रधार की भूमिका अशोक कुमार जैसे नामी अभिनेता निभाते थे।
धारावाहिक के पात्रों में सबसे लोकप्रिय थीं दादी इमरती देवी। वह परिवार की सबसे अनुभवी सदस्य थीं, जिनकी सलाह, स्नेह और अपनापन हर दर्शक को अपनी दादी की याद दिलाता था। सुषमा सेठ के सहज अभिनय ने इस किरदार को इतना प्रभावशाली बना दिया कि दादी केवल पर्दे पर दिखने वाला चरित्र नहीं रहीं, बल्कि हर घर की अपनी दादी बन गईं।
धारावाहिक के बीच, कहानी में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया। एक एपिसोड में दादी को कैंसर होने की जानकारी सामने आती है। यह खबर सुनते ही दर्शकों को लगा कि अब दादी के बीमार किरदार को दिखाया जाएगा और फिर कहानी में दादी की मृत्यु दिखाकर उनके किरदार को धारावाहिक से समाप्त कर दिया जाएगा।
उस दौर में हम लोग धारावाहिक का जुड़ाव दर्शकों के साथ इतना भावनात्मक था कि वे इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर सके। नतीजा यह हुआ कि दूरदर्शन के मुख्यालय, निर्माता और लेखक मनोहर श्याम जोशी के पास बड़ी संख्या में पत्र पहुंचने लगे। हजारों दर्शकों ने अनुरोध किया कि दादी को कहानी से अलग न किया जाए। अनेक लोगों ने फोन करके भी अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। उस समय न सोशल मीडिया था और न ही ऑनलाइन अभियान, फिर भी दर्शकों ने केवल चिट्ठियों के जरिए यह साबित कर दिया कि दादी उनके लिए एक काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि परिवार की बुजुर्ग सदस्य जैसी थीं।
दर्शकों की इस अभूतपूर्व प्रतिक्रिया ने यह दिखा दिया कि ‘हम लोग’ केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं था। यह लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका था। बच्चे दादी में अपनी दादी को देखते थे, युवा उनकी सीख को जीवन का अनुभव मानते थे और बुजुर्गों को उनमें अपना प्रतिबिंब दिखाई देता था। यही कारण था कि जब कहानी में उनकी बीमारी दिखाई गई, तो लोगों ने उसे केवल पटकथा का हिस्सा नहीं माना, बल्कि अपने परिवार के किसी सदस्य की पीड़ा की तरह महसूस किया। भारतीय टेलीविजन के इतिहास में शायद यह पहला अवसर था, जब किसी काल्पनिक पात्र के भविष्य को लेकर दर्शकों ने इतनी बड़ी संख्या में प्रतिक्रिया दी और निर्माताओं तक अपनी भावनाएं पहुंचाईं।
दादी इमरती देवी का किरदार धारावाहिक की सबसे बड़ी पहचान बन गया। ‘हम लोग’ के कुल 156 एपिसोड प्रसारित हुए। सुषमा सेठ ने अपने अभिनय से दाजी के इस किरदार को ऐसी पहचान दी कि जब 17 दिसंबर, 1985 को यह शो समाप्त हुआ, तब कई दर्शकों ने इसके अंत पर विरोध प्रदर्शन करके अपना भावनात्मक जुड़ाव व्यक्त किया। उस जमाने में धारावाहिक को 5 करोड़ लोगों ने देखा। जिसका प्रभाव यह हुआ कि सुषमा सेठ को बाद में फिल्मों में भी मां, दादी और नानी जैसे किरदारों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाने लगा।
‘हम लोग’ धारावाहिक ने यह साबित कर दिया था कि टेलीविजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं को जोड़ने वाली ताकत भी हो सकता है। जिस दौर में न इंटरनेट था और न सोशल मीडिया, उस समय दर्शकों ने केवल चिट्ठियों के जरिए अपनी आवाज निर्माताओं तक पहुंचाई और यह दिखा दिया कि एक काल्पनिक किरदार भी लोगों के जीवन का हिस्सा बन सकता है।
दादी के कैंसर वाले प्रसंग ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास में वह अनोखा अध्याय लिखा, जब एक काल्पनिक बीमारी और उसके मरीज ने पूरे देश को भावुक कर दिया। यही कारण है कि चार दशक बाद भी ‘हम लोग’ और उसकी दादी भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम इतिहास की ऐसी अमर स्मृति हैं, जिन्हें समय कभी धुंधला नहीं कर सकता।

