2004 Dimapur Bomb Blast: यह 2 अक्टूबर, 2004 की बात है। उस दिन नागालैंड का दीमापुर रेलवे स्टेशन हमेशा की तरह चहल-पहल से भरा था। लेकिन, सुबह करीब 9:30 बजे, एक जबरदस्त बम धमाके ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया। टिकट काउंटर और प्लेटफॉर्म का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो गया। लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे क्योंकि कई लोग बुरी तरह घायल हो गए थे।
ठीक एक मिनट बाद, पास के हांगकांग मार्केट में दूसरा धमाका हुआ। इन दो धमाकों में लगभग 30 बेगुनाह नागरिक मारे गए, जबकि करीब 100 लोग घायल हो गए। इस घटना ने न सिर्फ नागालैंड बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। लेकिन इस हमले की साजिश किसने रची थी और इसके पीछे असल मकसद क्या था? इन सवालों के जवाब मंगल महतो ने दिए। उनका इस धमाके की घटना से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन उन्होंने इस मामले में एक बहुत अहम सुराग दिया।
शुरुआत में, सच का पता लगाने के लिए राज्य सरकार ने कुछ ही घंटों के भीतर दो जांच शुरू कीं। हालांकि, कोई ठोस सबूत नहीं मिला और आखिरकार इस मामले को ‘कोल्ड केस’ (ठंडे बस्ते में पड़ा मामला) मानकर बंद कर दिया गया।
फिर, एक बिल्कुल अप्रत्याशित जगह से इस मामले में एक अहम सुराग मिला। 24 जुलाई, 2010 को दीमापुर ईस्ट पुलिस ने असम के लखीमपुर में अबू सैयद को एक अलग आपराधिक मामले के सिलसिले में गिरफ्तार किया। जांच के दौरान, पुलिस ने उससे 2004 के दीमापुर बम धमाकों के बारे में भी पूछताछ की, जो लंबे समय से अनसुलझे थे। सैयद से पूछताछ के दौरान जांचकर्ताओं को मंगल महतो नाम के एक व्यक्ति के बारे में पता चला, जिससे वह अक्सर दीमापुर में शराब के अड्डों पर मिलता था। यहीं से पूरा मामला एक साथ जुड़ गया।
महतो को पहले ऑटो-रिक्शा चोरी के मामले में गिरफ्तार किया गया था और उसने चुमौकेदिमा सेंट्रल जेल में लगभग चार महीने बिताए थे। लेकिन जेल में बिताया गया उसका समय बाद में एक और वजह से अहम साबित हुआ। इस दौरान, महतो को हुकुम अली और कई दूसरे कैदियों के पास रखा गया था। वे सभी 2005 में किसी दूसरे अपराध के लिए जेल भेजे गए थे। महतो को धीरे-धीरे पता चला कि ये वही लोग थे जिनका संबंध 2004 के दीमापुर बम धमाके के मामले से था।
छह साल बीत जाने के कारण, उन लोगों को शायद लगा कि मामला भुला दिया गया है। नतीजतन, वे जेल के अंदर हमले के बारे में खुलकर बात करने लगे। महतो चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। उनकी बातों से उसे पता चला कि वे लोग दीमापुर रेलवे स्टेशन और हांगकांग मार्केट में बम लगाने में शामिल थे। उसने उन्हें ₹10 लाख के पेमेंट को लेकर बहस करते हुए भी सुना, जो इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए तय किया गया था। उस समय, महतो ने जो बातें सुनीं, वे शायद जेल की आम बातचीत जैसी लगी हों, लेकिन बाद में वे बहुत अहम साबित हुईं। इससे जांच करने वालों को एक ऐसे मामले में अहम सुराग मिला जो छह साल से अनसुलझा पड़ा था।
जब महतो को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया, तो उसने पुलिस को वह सब कुछ बताया, जो उसने जेल में सुना था। इस जानकारी के आधार पर, दीमापुर ईस्ट पुलिस स्टेशन के तत्कालीन इंचार्ज अधिकारी ने 3 अगस्त और 6 सितंबर 2010 को उस मामले की जांच फिर से शुरू की, जो छह साल से बंद पड़ी थी। पुरानी फाइलों और पहले मिली जानकारियों की समीक्षा की गई। इसके बाद, 20 सितंबर को असम राइफल्स, SIB, CRPF, स्पेशल ब्रांच और दीमापुर पुलिस की एक संयुक्त टीम ने आगे की कार्रवाई शुरू की। जेल में बंद कई संदिग्धों, जिनमें अब्दुल कलाम, बाबुल हुसैन, हैजुल अली और शाजन अली शामिल थे, से पूछताछ की गई। जांच के दौरान, बाबुल हुसैन ने कथित तौर पर कबूल किया कि उसने हुकूम अली के कहने पर और पनास अली, स्वर्गीय नाजिम उद्दीन, नूर जमाल और हैजुल अली की मदद से हांगकांग मार्केट में बम लगाया था।
जांच में हमले के पीछे की वजह का पता लगाने पर भी ध्यान दिया गया। उस समय के पुलिस अधीक्षक जनार्दन सिंह के अनुसार, हमले का संभावित मकसद केंद्र सरकार और नागा विद्रोही समूहों के बीच 1997 से चल रही शांति प्रक्रिया में बाधा डालना था। 2013 में, दस में से नौ आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इस बीच, 9 सितंबर 2010 को पुलिस हिरासत में नाजिम उद्दीन ने आत्महत्या कर ली, जबकि स्टेशन पर बम लगाने वाले समूह के नेता हुकूम अली की 2014 में जेल में प्राकृतिक कारणों से मौत हो गई।
इस तरह, मंगल महतो से मिली जानकारी ने दीमापुर बम विस्फोट मामले को एक नई दिशा दी। जो मामला, छह साल से अनसुलझा पड़ा था, उसमें नई जानकारी के साथ जांच ने फिर से जान डाल दी। इस मामले से पता चला कि किसी अपराध को सुलझाने के लिए जरूरी सुराग हमेशा घटनास्थल पर ही नहीं मिलता। कभी-कभी, अपराध का सबसे अहम राज ऐसी जगहों पर छिपा हो सकता है, जिनके बारे में किसी ने सोचा भी न हो।

