श्रृंगेरी से शारदा पीठ तक : कैसे कर्नाटक ने 76 साल बाद देवी को वापस कश्मीर भेजा?

प्राचीन और महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर शारदा पीठ

शारदा पीठ विश्व-प्रसिद्ध ज्ञान, दर्शन और संस्कृत ग्रंथों का केंद्र था। शारदा पीठ मुख्य रूप से कश्मीर के पीओके (पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर) में नीलम घाटी में स्थित एक प्राचीन और महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर है, जो ज्ञान और शिक्षा का एक महान केंद्र था। 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान-समर्थक कबायली हमलावरों और इस्लामी कट्टरता ने इसे निशाना बनाया। उस समय भी यह भारत की सीमा के अंदर था।

लेकिन 1 जनवरी 1949 को जम्मू-कश्मीर में युद्ध विराम लागू हुआ, तो सब कुछ बदल गया। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से पर कब्जा कर लिया जहां शारदा पीठ था। उसे पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) कहा जाने लगा। शारदा पीठ अपनी ही सभ्यता से कट गई। पूजा-पाठ बंद हो गया। तीर्थयात्रा हमेशा के लिए रुक गई। इसके बाद शारदा पीठ धीरे-धीरे खामोश हो गई और आज खंडहर बन गई।

पीओजेके स्थित मूल शारदा पीठ और कश्मीर के तीतवाल में बना नया शारदा मंदिर (सोर्स लिंक: पाञ्चजन्य)

भारत के बौद्धिक इतिहास का यह अनमोल रत्न कैसे खो गया और अब उसकी विरासत फिर से कैसे जीवित हो रही है, यह समझने के लिए हमें 1947 में शारदा पीठ की ओर गई आखिरी तीर्थयात्रा को याद करना होगा।

1947 में शारदा पीठ की आखिरी यात्रा

सितंबर 1947 में आखिरी बार कश्मीरी पंडित तीर्थयात्री पुराने रास्ते पर चले। वे कुपवाड़ा से निकले और नीलम घाटी की ओर बढ़े। हाथों में केसरिया ध्वज लिए वे शारदा पीठ पहुंचे। यह पीठ मुजफ्फराबाद के पास शारदी गांव में है। आज यह जगह नियंत्रण रेखा के उस पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में है। वहां का मंदिर अब बिना छत का खंडहर बन चुका है। जो कभी ज्ञान का महान केंद्र था, वहां चारों तरफ आज चाय की दुकानें, कैफे और फौजी चौकियां हैं।

अपनी शारदा पीठ तक पहुंच अब बंद है। इसलिए भक्तों ने कश्मीर में ही एक नया शारदा माता मंदिर बना लिया है। जब कर्नाटक के श्रृंगेरी मठ (Sringeri Math) से शारदा देवी की नई मूर्ति तीतवाल (कश्मीर) पहुंची, तो यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था। यह 76 साल बाद सभ्यता की घर-वापसी का हिस्सा था।

हम आपको पूरी कहानी सुनाते हैं कैसे 1947 हमें शारदा पीठ से दूर कर दिया गया और उसके बाद मंदिर धीरे-धीरे कैसे पूरी तरह बर्बाद हो गया।

1947 : विभाजन, युद्ध और एक आस्था केंद्र में सन्नाटा

22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। कुछ ही दिनों में मुजफ्फराबाद और नीलम घाटी पर उसका कब्जा हो गया। शारदा पीठ उस हमले के रास्ते से सिर्फ 10 किलोमीटर दूर थी, इसलिए वह दुश्मन के इलाके में चली गई। सदियों से चली आ रही शारदा यात्रा एक झटके में बंद हो गई।

एक सभ्यता का बड़े केंद्र को नष्ट किया गया (तस्वीर साभार: X)

1930 के दशक तक यह यात्रा बिना किसी रुकावट के होती रही थी। फिर 31 दिसंबर 1948 को युद्ध विराम हुआ। नियंत्रण रेखा खींची गई और कश्मीर दो टुकड़ों में बंट गया। शारदा पीठ पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) के हिस्से में चली गई। कम-से-कम छठी शताब्दी ईस्वी से मौजूद इस तीर्थ तक पहुंच पहली बार पूरी तरह बंद हो गई। एक पूरी सभ्यता का बड़ा केंद्र खामोश पड़ गया। हिंदुओं का वहां जाना हमेशा के लिए रुक गया।

कश्मीर की ओर वापसी की यात्रा
यह नया सफर दक्षिण भारत से शुरू हुआ। कर्नाटक के श्रृंगेरी शारदा पीठम् से, जिसे आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी के अंत में (लगभग 788-820 ई.) स्थापित किया था। इसका मकसद कश्मीर की ज्ञान-देवी शारदा की परंपरा को जीवित रखना था। 2023 की शुरुआत में जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ और श्री विदुशेखर भारती ने शारदा देवी की नई मूर्ति का प्राण-प्रतिष्ठा किया।

तीतवाल का शारदा मंदिर और श्रंगेरी मठ द्वारा भेंट की गई शारदा मां की मूर्ति , फोटो क्रेडिट : deccanherald.com, kashmirtourpackage.org

यह मूर्ति दो साल में तैयार की गई थी। 7 मार्च 2023 को मूर्ति श्रृंगेरी से रवाना हुई। अब शुरू हुई 2500 किलोमीटर लंबी उत्तर की यात्रा। रास्ते में बंगलुरु, हैदराबाद, नागपुर, दिल्ली और जम्मू से गुजरते हुए यह यात्रा आगे बढ़ी। हर जगह हजारों लोग उमड़े। यह सिर्फ मूर्ति की यात्रा नहीं थी। यह 1947 के बिछड़े के 76 साल बाद कश्मीर की खोई हुई देवी की घर-वापसी का प्रतीक थी।

नियंत्रण रेखा के पास नया मंदिर
20 मार्च 2023 को शारदा देवी तीतवाल पहुंची। यह जगह कुपवाड़ा जिले में है और नियंत्रण रेखा (LoC) से सिर्फ 2.5 किलोमीटर दूर है। यहीं पर एक शारदा मंदिर पहले से था, जो अक्टूबर 1947 के कबायली हमले में तबाह हो गया था। स्थानीय संगठनों और भक्तों ने इसे फिर से बनवाया।

नया मंदिर 22 मार्च 2023 को खोला गया। यह तारीख कश्मीरी नवरेह (नया साल) के साथ जुड़ी थी। मंदिर ठीक उसी दिशा में बना है, जिधर सीमा के पार असली शारदा पीठ है। मानो, वह चौकीदारी कर रहा हो। विभाजन के बाद पहली बार शारदा देवी की पूजा फिर से कश्मीर की हिमालयी वादियों में शुरू हुई और वह भी भारतीय भूमि पर।

नए मंदिर की आवश्यकता क्यों पड़ी
76 साल तक शारदा पीठ तक पहुंच बंद रहने के बाद नया मंदिर बनाना ऐतिहासिक जरूरत बन गया था। शारदा पीठ कभी कश्मीरी पंडितों की पहचान का बौद्धिक दिल थी। नीलमत पुराण (6ठी-8वीं शताब्दी) और कल्हण की राजतरंगिणी (लगभग 1148-1150 ई.) में इसे कश्मीर की ज्ञान-देवी का आसन बताया गया है। 1947 तक हर साल यहां तीर्थयात्रा होती रही थी। विभाजन ने शारदा परंपरा को उसके जन्मस्थान से ही उजाड़ दिया। अब तीतवाल में नया मंदिर बनने से यात्रा की पुरानी परंपरा फिर जीवित हो गई। सांस्कृतिक यादें ताजा हो गईं। भले ही असली जगह अभी भी विदेशी कब्जे में है, लेकिन कश्मीर की ज्ञान-देवी अब फिर से अपनी घाटी में लौट आई है।

सीमा के उस पार मूल मंदिर का क्या हुआ?
नियंत्रण रेखा के उस पार असली शारदा पीठ की हालत तेजी से खराब होती चली गई। 1915 में औरेल स्टीन ने यहां की तस्वीरें ली थीं, मंदिर तब भी मजबूत और सुरक्षित था। 1931 में पुरातत्वविद् आर.सी. काक ने इसे लगभग पूरी तरह साबुत बताया था। गर्भगृह पूरा था, ऊपरी हिस्सा भी मौजूद था। आज पाकिस्तान के कब्जे वाली इस जगह पर छत गिर चुकी है। पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़े गायब हैं। कोई सरकारी संरक्षण नहीं है। वर्ष 2017 से 2023 के बीच आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि मंदिर परिसर के चारों तरफ चाय की दुकानें, कैफे और फौजी चौकियां बन गई हैं। दक्षिण एशिया के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक को इस तरह से नष्ट किया जा रहा है। यह उपेक्षा संयोग से नहीं हुई। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में इस्लाम से पहले की विरासत के प्रति यही संस्थागत उदासीनता का तरीका रहा है।

नया मंदिर क्या दर्शाता है?
तीतवाल का शारदा मंदिर (2023) एक जवाबी इतिहास है। यह घोषणा है कि भले ही सीमाएं बांट दें, यादें नहीं बंटतीं। नियंत्रण रेखा से कुछ मीटर दूर खड़ा यह मंदिर, सामने खंडहर बनी असली शारदा पीठ को चुपचाप निहारता है, जैसे उसकी रक्षा कर रहा हो। यह एक सच्चाई की याद दिलाता है, जिसे भारत कभी भूल नहीं सकता। पवित्र भूगोल तब तक जिंदा रहता है, जब तक हम उसे याद करते हैं, उसे फिर से बनाते हैं और उसमें जीते हैं। जब तक असली शारदा पीठ को संरक्षण, सुरक्षा और उसकी पुरानी पहचान (विश्व-स्तरीय संस्कृत ज्ञान-केंद्र) वापस नहीं मिल जाती, तब तक यह नया मंदिर यह भरोसा दिलाता रहेगा कि देवी अपनी पहाड़ियों में लौट आई हैं। और यह साफ संदेश देता है कि 1947 में विस्थापित हुई हिंदू सभ्यता अपने ज्ञान-केंद्रों को मिटने नहीं देगी।