तानाजी मालुसरे ने कैसे 50 सैनिकों के साथ मुगलों से जीता सिंहगढ़ का किला?

तानाजी मालुसरे

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इतिहास का एक ऐसा युद्ध, जिसमें सिर्फ 50 मराठा सैनिकों ने 1,800 से अधिक मुगल सैनिकों को खदेड़कर सिंहगढ़ किले (कोंढाणा किले) पर कब्जा किया था। इस युद्ध के नायक थे मराठा सेनापति ‘तानाजी मालुसरे’। यह युद्ध इतना आसान नहीं था। किले की खड़ी चट्टानें, पहाड़ी क्षेत्रों की गहरी खाइयां, अंधेरी रात और सभी बुर्जों पर मुगल सैनिकों का सख्त पहरा। 

इन सब खतरों के बीच ‘तानाजी मालुसरे’ अपने 50 साथियों के साथ मौत से आंख मिलाते हुए आगे बढ़ते गए। सिंहगढ़ किले की वह रात इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गई। जब 50 मराठा सैनिकों ने किले से मुगल सल्तनत का झंडा उखाड़कर, भगवा ध्वज फराया, तो यह दक्कन की राजनीति का स्थाई बदलाव था। 

 सिंहगढ़ किले में तानाजी की प्रतिमा, इमेज सोर्स- bharatdiscovery.org 

सह्याद्रि पर्वतमाला की ऊंचाइयों पर स्थित सिंहगढ़ किला मराठा सामाज्य के लिए रणनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। यह किला पुणे सहित आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा का मुख्य आधार था। लेकिन मुगल आक्रांता औरंगजेब ने अपनी कूटनीति से संधि करके किले को अपने आधीन कर लिया। यह मराठा स्वाभिमान पर सीधा प्रहार था। छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी माता जीजाबाई ने सिंहगढ़ किले पर फिर से अधिकार करने को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा। शिवाजी महाराज ने इसकी जिम्मेदारी अपने सबसे भरोसेमंद मित्र और वीर तानाजी मालुसरे को दी। मुगलों ने किले की रक्षा की जिम्मेदारी किलेदार उदयभान राठौड़ को दी थी, जिसे अपनी वीरता पर अभिमान था।

तानाजी मालुसरे के सामने सिंहगढ़ किले पर आक्रामण करना एक बड़ी चुनौती थी, किले के चारों ओर खड़ी चट्टानें, 40 फीट ऊंची दीवारें और उनके नीचे गहरी खाइयां, जिनसे यह किला लगभग अभेद था। लेकिन तानाजी ने स्थानीय कोलियों के साथ अच्छे संबंध बनाकर किले की भौगोलिक स्थिति की जानकारी इकठ्ठा की। फिर उन्होंने किले पर चढ़ाई करने के लिए एक ऐसे स्थान को चुना, जहां से मुगलों को भी आक्रमण होने की कल्पना तक नहीं थी। वह स्थान था, डोंगरी चट्टान, जहां गहरी खाइयां थी।

 4 फरवरी 1670 की अंधेरी रात में तानाजी ने रस्सियों के सहारे किले पर चढ़ने की योजना बनाई। उन्होंने करीब 300 सैनिकों के साथ चढ़ाई प्रारंभ की। लेकिन सिर्फ 50 मराठा सैनिक ही किले की प्राचीर पर चढ़ पाए थे कि रस्सी टूट गई। यह इस युद्ध का निर्णायक मोड़ था, अब तानाजी के 50 सैनिकों का सामना करीब 1800 मुगल सैनिकों से था। 

सिंहगढ़ किला (कोंढाणा किला) इमेज सोर्स- दिव्य मराठी

किले के भीतर प्रवेश करते ही मराठा सैनिकों ने पहरेदारों पर तलवार से हमला किया। कल्याण द्वार और किले के अन्य प्रवेश द्वारों पर तैनात मुगल सैनिक तानाजी की तलवार का प्रहार सह नहीं पाए। उनकी तलवार के एक प्रहार से कई मुगल सैनिको का सिर धड़ से अलग होता रहा। देखत ही देखते 700 मुगल सैनिक मारे गए। युद्ध में तानाजी की मौजूदगी से मराठा सैनिकों का उत्साह चरम पर था। मात्र 50 सैनिकों ने मुगलों में हलचल पैदाकर दी। तानाजी से डरकर मुगल भाग खड़े हुए और किलेदार  उदयभान राठौड़ के पास पहुंचे क्योंकि इसके पहले उदयभान राठौड़ का सेनापति और उसके 12 पुत्र तानाजी की तलवार के प्रहार से मारे जा चुके थे।

अब तानाजी के सामने था किलेदार उदयभान राठौड़। दोनों वीर योद्धा। युद्ध का घमासान शुरू हुआ। ज्यादा देर तक तानाजी के सामने उदयभान राठौड़ का टिक पाना संभव नहीं था, लेकिन इसी बीच दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। उदयभान राठौड़ की तलवार के प्रहार से तानाजी की ढाल टूटी और प्रहार से उनका बायां हाथ कटकर जमीन पर गिरा। खून की धार बह पड़ी। फिर भी दाएं हाथ से तानाजी ने युद्ध जारी रखा। उन्होंने अपने अंतिम और निर्णायक वार से उदयभान को मौत के घाट उतार दिया। 

उदयभान के मरते ही बचे हुए मुगल सैनिक भाग खड़े हुए। एक बार फिर से सिंहगढ़ किला मराठों के कब्जे में आ गया। लेकिन इस युद्ध में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए। छत्रपति शिवाजी महाराज को सिंहगढ़ किला फतेह और  तानाजी के बलिदान की जानकारी मिली। उनके व्यथित मुंह से एक अमर वाक्य निकला, दो आज भी महाराष्ट्र में कहावत के रूप में प्रचलित है। ‘गड आला पण सिंह गेला’ यानी, ‘गढ़ तो आ गया लेकिन ‘सिंह’ चला गया। 

1600 ईसवी में जन्मे ताना जी की मृत्यु  70 साल की आयु में 4 फरवरी 1670 को सिंहगढ़ युद्ध  लड़ते हुए हुई। उन्होंने अपने बचपन में पिता सरदार कोलाजी से घुड़सवारी, तलवारबाजी और गुरिल्ला युद्ध के गुर सीखे। मावल क्षेत्र की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में पले तानाजी पर्वतीय युद्ध कला और युद्ध रणनीति में परांगत थे। अपने पिता सरदार कोलाजी की मृत्यु के बाद वह उमरथे गांव के सरदार बने। वह अपने युद्ध कौशल और वीरता के चलते छत्रपति शिवाजी महाराज के सबसे करीबियों में से एक थे। माता जीजाबाई उन्हें पुत्र के समान स्नेह करती थीं।