ऑपरेशन पोलो से 153 वर्ष पहले भी हैदराबाद के निजाम ने मराठों के सामने टेके थे घुटने!

खारदा युद्ध

क्या आप जानते हैं, 1948 के भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन पोलो से करीब 153 वर्ष पहले ही मराठों ने हैदराबाद के निजाम को घुटनों के बल ला दिया था। 1795 में मराठों और निजाम की सेना के बीच हुए ‘खारदा युद्ध’ में निजाम की शर्मनाक हार हुई थी। खारदा का युद्ध एक ऐसी घटना है, जो अक्सर बड़ी लड़ाइयों की चमक में कहीं दब जाती है, लेकिन परिणाम भारत के लिए निर्णायक और दूरगामी था। यह युद्ध सिर्फ तलवारों और तोपों की टक्कर भर नहीं था, बल्कि निजाम के अहंकार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई भी थी, जिसके बाद मराठों की शक्ति को अंग्रेजों ने भी महसूस किया था। सवाल उठता है कि निजाम ने मराठों से टकराने का जोखिम क्यों लिया?

खारदा युद्ध, इमेज सोर्स- फेसबुक

खारदा के युद्ध की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं, जब मराठा और हैदराबाद निजाम की सेना, मैसूर के टीपू सुल्तान के विरुद्ध एक साथ लड़ी थीं। इसके बाद निजाम ने मराठों को चौथ और सरदेशमुखी कर देने का वादा किया था। लेकिन यह संधि अस्थायी साबित हुई। मीर निजाम अली खान (आसफ जाह इल) ने मराठों को कर देना बंद कर दिया।

मराठा साम्राज्य ने 1791 में नाना फडणवीस के नेतृत्व में अपने दो दूत गोविंदाओ पिंगले और गोविंदाओ काले को निजाम के दरबार में भेजा, ताकि कर-विवाद को बातचीत से सुलझाया जा सके। लेकिन बातचीत आरम्भ होते ही निजाम ने उलटे मराठों पर 2.5 लाख रुपए बकाया होने का दावा कर दिया। साथ ही ईस्ट ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों से इस मामले में मध्यस्तता करने का अनुरोध किया।

कर के मामले को लेकर 2 वर्षों तक मराठों और निजाम के बीच बातचीत का दौर जारी रहा। लेकिन इसी बीच निजाम ने अपनी सेना को 2 बटालियन से बढ़ाकर 23 बटालियनों में कर लिया। निजाम के इस कदम ने मराठों को चौकन्ना कर दिया। बातचीत का सिलसिला 1794 तक जारी रहा, लेकिन तब तक मराठों को यह आभास हो गया था कि अब बिना युद्ध के बात नहीं बनने वाली। रणनीति के तहत निजाम ने समय पाकर अपनी सैन्य ताकत का विस्तार किया। उसकी सेना में फ्रांसीसी सैन्य अफसरों द्वारा प्रशिक्षत 45 हजार पैदल और इतनी ही संख्या में घुड़सवार सैनिक थे। साथ ही करीब 1 लाख तोपें उनकी सेना की मजबूती थीं। उसे ब्रिटिश इंडिया कंपनी का भी समर्थन प्राप्त था। अपनी इसी ताकत के अहंकार में मस्त निजाम मराठों को युद्ध की चुनौती दे बैठा।

मराठों को पहले से भी पता था कि निजाम केवल बातचीत का नाटक कर रहा है, उसका उद्देश्य तो केवल युद्ध है। इसलिए सवाई माधवराव पेशवा व नाना फडणवीस के नेतृत्व में पूरा मराठा संघ एकजुट हो चुका था। शिंदे, होल्कर, गायकवाड़ और भोंसले सभी सरदार, भगवा ध्वज के नीचे आ चुके थे। जनवरी 1795 में जब निजाम की सेना ने युद्ध के लिए दक्कन के बीदर से कूच किया तो, मराठों ने उसका पीछा किया और खारदा के मैदान में घेरना शुरू कर दिया। आखिर में 11 मार्च, 1795 को दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ। पूरे दिन भीषण युद्ध हुआ, जिसमें मराठा सेना भारी रही। लेकिन रात में दोनों सेनाएं पीछे हट गईं।

युद्ध को लेकर मराठों की योजना ही कुछ और थी। दिनभर की लड़ाई के बाद जब रात हुई, निजाम और उसकी सेना अपने में मस्त थी, तभी मराठों ने अचानक गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। निजाम की सेना के हजारों सैनिक मारे गए, बाकी बचे सैनिक भाग खड़े हुए। भारी तोपखाने और संख्या में अधिक होने के बाद भी निजामी सेना मराठों के हमले को सह नहीं सकी। बचे सैनिकों के साथ निजाम खारदा किले में छिपने पर मजबूर हुआ।

अब निजाम ने ब्रिटिश इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल सर जॉन शोर से मदद मांगी क्योंकि पहले उसने सहायता करने का आश्वासन दिया था। लेकिन युद्ध के दौरान उसे मराठों की ताकत का अंदाजा हो गया था, जिसके भय से उसने आने से मना कर दिया। अंग्रेजी सेना के सहयोग न मिलने से निजाम 17 दिनों तक खारदा किले में छिपा बैठा रहा। मराठों ने किले की घेराबंदी कर दी। अंत में निजाम की समझ में आ गया कि अब हार मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

आखिरकार निजाम मीर निजाम अली खान का अहंकार टूटा। उसने मराठों को एक कटार और मुहर भेजकर संधि का संकेत दिया। खारदा की संधि उसके लिए बहुत अपमानजमक रही। उसे मराठों को 3 करोड़ का हर्जाना के साथ-साथ दौलताबाद, औरंगाबाद और सोलापुर किले का क्षेत्र भी सौंपना पड़ा।

इस जीत से दक्कन के क्षेत्र में भगवा का प्रभुत्व बढ़ा। खारदा की यह लड़ाई आज भी मराठा साहस, एकता और रणनीतिक कौशल की अमर कहानी बनकर इतिहास में दर्ज है।