क्रांतिकारी मदनसिंह मतवाले : जब तिरंगा फहराकर निजाम की सत्ता को दी गई खुली ललकार

क्रांतिकारी मदनसिंह मतवाले

भारत की आजादी के समय, जब पूरा देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त होकर एक नए भविष्य का सपना देख रहा था, तब हैदराबाद रियासत का निजाम मीर उस्मान अली खान भारत से अलग होकर इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना देख रहा था। यह वही हैदराबाद था, जहां की लगभग 84 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू थी, लेकिन सत्ता, शासन और ताकत पूरी तरह निजाम और उसकी इस्लामिक रजाकार सेना के हाथों में थी। आजादी के बाद भी यहां भारतीय तिरंगे पर प्रतिबंध था और भारत माता का नाम लेना अपराध माना जाता था।

ऐसे दमनकारी वातावरण में एक युवा क्रांतिकारी उठा, जिसका नाम था मदनसिंह मतवाले। 14 अगस्त 1948 को, जब निजाम भारत की स्वतंत्रता को ठुकरा चुका था, तब मदनसिंह मतवाले ने आजादी की पहली बरसी पर अपने घर पर तिरंगा फहराकर खुलेआम निजाम की सत्ता को ललकारा। यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी, बल्कि हैदराबाद को भारत का अभिन्न अंग बनाने की हुंकार भी थी, जिसकी कीमत मदन लाल को अपने प्राणों से चुकानी पड़ी।

हैदराबाद रियासत में हिंदुओं पर अत्याचार कोई नई बात नहीं थी। जबरन धर्मांतरण, हिदुओं पर अत्याधिक कर, सामाजिक भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता पर पाबंदियों ने जनजीवन को त्रस्त कर रखा था। इसी दमन के विरुद्ध 1930 के दशक में आर्य समाज के नेतृत्तव में निजाम के शासन के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन खड़ा हो गया। आर्य समाज ने न केवल धार्मिक स्वतंत्रता की मांग की, बल्कि सामाजिक सुधार और मानवाधिकारों के लिए भी संघर्ष किया।

यही आंदोलन मदनसिंह मतवाले के जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। आर्य समाज के विचारों से प्रेरित होकर वे अपनी किशोरावस्था में ही आंदोलन से जुड़े। सत्याग्रह, जनजागरण और प्रतिरोध के रास्ते पर चलते हुए उन्होंने देखा कि कैसे संगठित संघर्ष से निजाम को भी झुकने पर मजबूर किया जा सकता है। यही पहला अनुभव था, जिसने मदनसिंह मतवाले को मतवाला क्रांतिकारी बनाया।

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, फिर भी हैदराबाद की धरती पर आजादी का सूरज नहीं उगा। निजाम ने भारत में विलय से मना कर दिया। साथ ही रजाकारों के माध्यम से आतंक का शासन और तीव्र कर दिया। ऐसे कठिन समय में आर्य समाज से मिली वैचारिक चेतना मदनसिंह मतवाले को चुप बैठने कहां दे सकती थी। उन्होंने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि भय के इस वातावरण को किसी न किसी प्रकार से तोड़ना ही होगा।

14 अगस्त 1948 को, आजादी की पहली वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर, उन्होंने हैदराबाद रियासत स्थित अपने घर की छत पर तिरंगा फहरा दिया। यह निजाम की सत्ता को सीधी ललकार थी। हैदराबाद पुलिस तुरंत वहां पहुंची, उन्हें गिरफ्तार किया गया और अनेकों अमानवीय प्रताड़नाएं दी गईं। इस दौरान वह गंभीर रूप से घायल हुए और इसके बाद वह कभी वापस नहीं लौटे। पुलिस हिरासत में ही उनकी हत्या कर दी गई। मदन सिंह मतवाले का यह बलिदान स्वतंत्र भारत के इतिहास में अमिट अध्याय बन गया।

मदन सिंह मतवाले के बलिदान ने हैदराबाद रियासत में रहने वाले हिंदुओं को झकझोर कर रख दिया। जो लोग भय के कारण चुप थे, अब वह भी खुलकर निजाम के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करने लगे। गांव-गांव, शहर-शहर, हैदराबाद मुक्ति की मांग तेज हुई। मदनसिंह मतवाले का नाम अब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आंदोलन का प्रतीक बन चुका था।

इस बढ़ते जनाक्रोश और रजाकारों की हिंसा की खबरें दिल्ली तक पहुंचीं। देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्थिति की गंभीरता को समझा। उन्होंने साफ कहा कि भारत की एकता से कोई समझौता नहीं होगा।

सरदार वल्लभ भाई पटेल के सामने झुका निजाम, फोटो क्रेडिट : swarajyamag.com

निजाम की इसी क्रूरता के परिणामस्वरूप हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सैन्य कार्रवाई की योजना ‘ऑपरेशन पोलो’ के नाम से बनी। मदनसिंह मतवाले के बलिदान के एक माह बाद ही 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद रियासत से निजाम की सत्ता ढह गई। हैदराबाद के भारत में औपचारिक विलय होते ही उस मतवाले क्रांतिकारी का बलिदान भी सफल हुआ।

11 मार्च 1925 को हैदराबाद रियासत में जन्में क्रांतिकारी मदनसिंह मतवाले, असाधारण साहस का पर्याय थे। अन्याय के प्रति उनके उग्र स्वभाव के चलते उन्हें लोग ‘मतवाले’ भी कहते थे। वह आर्य समाज के सिद्धांतों और राष्ट्रभक्ति से गहराई से प्रभावित थे। उनका निजी जीवन भी सरल, अनुशासित और त्यागी रहा। आज मदन सिंह मतवाले का नाम इतिहास की मुख्यधारा में भले ही सीमित हो, लेकिन हैदराबाद मुक्ति आंदोलन के इतिहास में मदनसिंह मतवाले आज भी अमर हैं। उनका यह बलिदान हमें सिखाता है कि राष्ट्र रक्षा के लिए हमे किसी भी त्याग से पीछे नहीं हटना चाहिए।