भारत के पहले आईआईटी बनने के पीछे एक रोचक कहानी है। जो स्वाधीनता संग्राम के संघर्ष को उसकी मिट्टी से जोड़ती है। जहां कभी ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के वीर सपूतों पर अत्याचार किए, उनकी आवाज को दबाने का असफल प्रसास किया, जिस इमारत में कभी स्वतंत्रता सेनानियों की बेड़ियों की आवाज गूंजती थी, वहीं कुछ वर्षों बाद भविष्य के इंजीनियरों के सपनों ने आकार लेना शुरू किया।
यह केवल एक आईआईटी के स्थापना की कहानी नहीं, बल्कि गुलामी के प्रतीकों को राष्ट्रनिर्माण के सबसे बड़े केंद्र में बदल देने का ऐतिहासिक काम भी था। यही कारण है कि आईआईटी खड़गपुर के बनने के इतिहास को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से अलग नहीं किया जा सकता।
आईआईटी खड़गपुर की कहानी की शुरुआत होती है 1930 से। इस दौरान पूरा बंगाल ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका था। बड़ी संख्या में युवा सशस्त्र क्रांति में शामिल हो रहे थे। अंग्रेजों के लिए उन क्रांतिकारियों को रोक पाना बड़ी चुनौती थी। क्रांतिकारियों द्वारा चटगांव शस्त्रागार पर कब्जा किए जाने के बाद से अंग्रेज भयभीत थे। इसलिए उन्होंने गिरफ्तार किए गए क्रांतिकारियों को सामान्य जेलों में रखने के बजाए, बहुत सुरक्षित स्थानों पर रखने की योजना बनाई। ऐसा इसलिए ताकि क्रांतिकारी दल से उन स्थानों को सुरक्षित रखा जा सके। जिसके बाद विशेष नजरबंदी शिविर बनाए गए। इन्हीं में से एक था कोलकाता से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर बना हिजली नजरबंदी शिविर, जिसकी स्थापना 1930 में हुई।
यहां अंग्रेज बड़ी सख्या में क्रांतिकारियों को नजरबंद रखते थे। साथ ही ब्रिटिश पुलिस के जवान उन पर खूब बर्बरता भी करते थे। इसी बीच 16 सितंबर 1931 को हिजली नजरबंदी शिविर में अंग्रेज पुलिस ने नजरबंद क्रांतिकारी संतोष कुमार मित्रा और तारकेश्वर सेनगुप्ता की गोलीमार हत्या कर दी।
इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वयं बलिदानियों का शव लेने हिजली पहुंचे, जबकि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने ब्रिटिश शासन के इस अत्याचार का तीखा विरोध किया। जिसके बाद यह शिविर 1937 में बंद हुआ, लेकिन 1940 में दोबारा खोल दिया गया। भारी विरोध के बाद अंतत: 1942 में अंग्रेजों को हिजली नजरबंदी शिविर को बंद करना पड़ा। जिसके बाद दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस शिविर पर अमेरिकी वायु सेना ने कब्जा कर लिया।
समय बदला। 1947 में जब देश को स्वतंत्रता मिली, तो भारत के सामने आधुनिक और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की बड़ी चुनौती थी। इसके लिए सबसे पहले उच्च तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता महसूस हुई। इसी योजना के तहत 1950 में उसी हिजली नजरबंदी शिविर की ऐतिहासिक इमारत को देश के पहले तकनीकी संस्थान के रूप में चुना गया।
अगस्त 1951 में यहां पहला शैक्षणिक सत्र शुरू हुआ, जिसमें 224 छात्र और 42 शिक्षक थे। उसी भवन में कक्षाएं लगीं, प्रयोगशालाएं बनीं और प्रशासनिक कार्यालय भी संचालित हुए, जहां कभी स्वतंत्रता सेनानियों को कैद करके रखा जाता था। इस तरह भारत के पहले आईआईटी की शुरुआत एक पूर्व नजरबंदी शिविर से हुई, जो विश्व इतिहास में भी अत्यंत दुर्लभ उदाहरण माना जाता है।
उस समय इस संस्थान का नाम केवल टेक्निकल इंस्टीट्यूट था। मार्च 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नए परिसर की आधारशिला रखी, जो हिजली भवन के निकट ही बनाया गया। बाद में 15 सितंबर 1956 को संसद ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (खड़गपुर) अधिनियम पारित किया, जिसके बाद टेक्निकल इंस्टीट्यूट का नाम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर यानी आईआईटी खड़गपुर हो गया। आज यही आईआईटी खड़गपुर भारत के सर्वश्रेष्ठ टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स में से एक है।
आईआईटी खड़गपुर का इतिहास इस बात का सशक्त प्रमाण है कि राष्ट्र यदि चाहे, तो अपनी पीड़ा को भी महान शक्ति में बदल सकता है। हिजली नजरबंदी शिविर कभी दमन, अन्याय और गुलामी का प्रतीक था, लेकिन स्वतंत्र भारत ने उसी इमारत को ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के केंद्र में बदल दिया। शायद यही इस संस्थान की सबसे बड़ी पहचान है। जिसकी नींव केवल ईंट-पत्थरों पर नहीं, बल्कि उन स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान से रखी गई थी, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता का सपना देखा था।
इसलिए देश का पहला आईआईटी केवल तकनीकी शिक्षा का संस्थान नहीं, बल्कि गुलामी से आत्मनिर्भरता तक भारत की ऐतिहासिक यात्रा का जीवंत प्रतीक भी है।

