जब दूरदर्शन ने रामायण को रिजेक्ट किया : दो साल की लड़ाई, जिसने भारतीय टेलीविजन को हमेशा के लिए बदल दिया

रामानंद सागर की रामायण 1987 में प्रसारित हुई

1980 के दशक के बीच में, वर्ष 1985 के आसपास, रामानंद सागर रामायण के फुल-लेंथ टीवी सीरियल बनाने के लिए एक बोल्ड प्रस्ताव लेकर दूरदर्शन के दिल्ली ऑफिस गए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें लगभग दो साल तक बार-बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा।

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दूरदर्शन के अधिकारियों ने मजाक उड़ाते हुए इस सीरियल को पुराने जमाने का ‘मुकुट-मूंछ’ वाला कार्यक्रम बताकर खारिज कर दिया। उनके अनुसार  यह सीरियल आधुनिक टेलीविजन के लिए सही नहीं था और उन्हें डर था कि इसको प्रसारित करने से सरकारी ब्रॉडकास्टर पर विवाद हो सकता है।

फिर भी, 11 जनवरी, 1987 को, जब पहला एपिसोड प्रसारित हुआ, तो लगन, एक पायलट की सफलता और मुख्य स्पॉन्सर ने इस हास्यास्पद संदेह खारिज करके  इस कार्यक्रम को भारत के सबसे बड़े टीवी कार्यक्रमों में से एक में बदल दिया।

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दूरदर्शन का दो साल का इनकार (1985-1986)

1985 में 70 साल के बुजुर्ग रामानंद सागर ने ऐसे समय में रामायण का प्रस्ताव रखा, जब टीवी पर पारिवारिक ड्रामा का बोलबाला था। दूरदर्शन समितियों ने सागर द्वारा प्रस्तुत तीन पायलटों को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि एक सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष चैनल पर धार्मिकता को बढ़ावा देना एक वैचारिक जोखिम हैं।

दूरदर्शन के नौकरशाह शाह बानो केस (1985) के बाद होने वाली प्रतिक्रिया को लेकर चिंतित थे और महाकाव्य को सांस्कृतिक के बजाय राजनीतिक चश्मे से देख और मान रहे थे। परंतु रामानंद सागर अपने प्रस्ताव पर डटे रहे और उन्होंने वाल्मीकि-तुलसीदास के 20 सालों के अपने अध्ययन से प्रेरणा ली।

बात साबित करना : विक्रम और बेताल (1985)

शक दूर करने के लिए, सागर ने 1985 में एमामी के आर.एस. अग्रवाल से हर एपिसोड के लिए मामूली ₹1 लाख के बजट में विक्रम और बेताल बनाया, जो रविवार को शाम 4 बजे प्रसारित होता था। खराब टाइमिंग के बावजूद, इसे बहुत ज्यादा दर्शक मिले, जिससे ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियों की अपील साबित हुई। 1985 की इस हिट ने अंदरूनी सोच बदल दी और 1986 के आखिर तक दूरदर्शन ने राजीव गांधी के सांस्कृतिक सीरियल को बढ़ावा देने के कदम से तालमेल बिठा ही लिया।

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स्पॉन्सर का बदलाव : सबसे पहले कोलगेट (1986 के आखिर में)

रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने 1986 के आखिर में सबसे पहले कोलगेट से संपर्क किया। विक्रम और बेताल सीरियल की जबरदस्त रेटिंग का फायदा उठाते हुए कोलगेट कंपनी मुख्य स्पॉन्सर बन गई। हिंदुस्तान लीवर और अरविंद मफतलाल ने उनका साथ दिया और ₹9 लाख प्रति एपिसोड (आज के हिसाब से ₹90 लाख) का फंड दिया। 1987 तक उमरगांव स्टूडियो में सीरियल के प्रोडक्शन बढ़ा दिया गया।

प्रीमियर और घटना (जनवरी 1987 से आगे)

रामायण का प्रीमियर 11 जनवरी, 1987 को दूरदर्शन पर हुआ और सीरीज़ के बीच तक 80%+ रेटिंग मिली। इसकी सफलता का आलम यह था कि  रविवार को इसके प्रसारण के समय सुबह 9:30 बजे सड़कें खाली हो जाती थीं। 1988 तक 78 से ज्यादा एपिसोड में, बीबीसी/लिम्का के अनुसार यह सीरियल दुनिया भर में 650 मिलियन दर्शकों तक पहुंचा। 2020 में दोबारा प्रसारण के साथ इसकी विरासत आज भी कायम है।