यह संघर्ष वर्ष 1840 में शुरू हुआ, जब अमेरिकी प्रेस्बिटेरियन मिशन के पादरी जोसेफ ओवेन प्रयागराज पहुंचे। उनके लिए यह मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन भर नहीं था, बल्कि वह ‘स्वर्ण भूमि’ थी, जहां एक साथ हजारों लोगों को प्रभावित किया जा सकता था, धर्मांतरित किया जा सकता था। पर वह यह नहीं समझ पाए कि वह एक ऐसी सभ्यता में प्रवेश कर रहे हैं, जो उनकी कल्पना से कहीं अधिक प्राचीन और कहीं अधिक सशक्त थी।

मिशनरियों का आगमन और तीर्थनगरी बनी उनका निशाना
मिशनरी गतिविधियों की शुरुआत इससे पहले वर्ष 1834 में हुई थी, जब रेव. विलियम रीड और रेव. जे.सी. लोरी ने लुधियाना में पहला केंद्र बनाया। लेकिन प्रयागराज (तब इलाहाबाद) उनकी नजरों में विशेष था। यहां संगम पर वर्ष भर स्नानार्थियों का प्रवाह रहता था, हर वर्ष माघ मेला लगता था और हर 12 वर्ष में महाकुंभ का विराट आयोजन होता था।
वर्ष 1841 तक ओवेन प्रयागराज पहुंच चुके थे। उन्होंने हिंदी, संस्कृत और फारसी सीखी ताकि उनका संदेश स्थानीय भाषा में स्वीकार्य लगे। धीरे-धीरे मेले की रेत पर ईसाई साहित्य-पर्चे, छोटी पुस्तकें, अनुवाद की हुई बाइबल फैलाई जाने लगीं।
1 जनवरी 1847 को प्रयागराज में एक चर्च मिशनरी प्रिंटिंग प्रेस स्थापित हुई, जिसका संचालन पहले रेव. जोसेफ वॉरेन और बाद में रेव. लॉरेंस जी. हे ने किया। इसकी फंडिंग नॉर्थ इंडिया बाइबल सोसाइटी (1845, आगरा) करती थी। फिर भी, साधुओं की धूनी जलती रही, अखाड़ों की शोभायात्रा रोज सुबह निकलती रही बिना रुके, बिना थके।
मेले में कैंप और पहली दर्ज कोशिश, इस पवित्र परंपरा को भेदने की
समय के साथ मिशनरियों की मौजूदगी और गहरी होती गई। वे मेले में जमीन मांगने लगे, शिविर लगाने लगे, साहित्य बांटने लगे और हिंदू परंपराओं पर खुली टीका-टिप्पणी करने लगे।
30 दिसंबर 1880 को पादरी जॉनस्टन ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मिस्टर विन्सन को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें पिछले 40 वर्षों से (यानी 1840 से) मेले में जमीन मिलती आई है। 2 जनवरी 1882 का उर्दू और फारसी में एक अन्य पत्र इसी बात की पुष्टि करता है।
ओवेन ने एक नई पद्धति भी शुरू की थी, हिंदुओं को परिवर्तित कर ‘देशी पादरी’ बनाना, जिन्हें फिर गांव-गांव भेजा जाता था। गोपीनाथ नंदी ऐसा ही एक प्रमुख परिवर्तित पादरी था। लेकिन इन प्रयासों के बीच भी शंख की गूंज, मंत्रों की ध्वनि और ‘हर हर गंगे’ का उद्घोष हर कोशिश को दबा देता था। सभ्यता अपने मार्ग पर चलती रही, जिसे कोई हिला नहीं पाया।
1857 : जब सभ्यता ने अपनी स्मृति से जवाब दिया
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक मिशनरियों को ब्रिटिश संरक्षण प्राप्त था, और इससे जनमानस में असंतोष बढ़ता गया। जब 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भड़का, वह केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक विद्रोह भी था। क्रांतिकारियों ने मिशनरियों को औपनिवेशिक दमन का हिस्सा समझा। जून 1857 में उन्होंने प्रयागराज स्थित अमेरिकन प्रेस्बिटेरियन मिशन की प्रिंटिंग प्रेस जला दी। यूरोपीय मिशनरी घबराकर इलाहाबाद किले में शरण लेने लगे और बाद में कलकत्ता (अब कोलकाता) भाग गए। लगभग 6-7 महीनों के लिए मिशनरी गतिविधियां पूरी तरह बंद हो गईं। लेकिन उन्हीं महीनों में साधुओं के शिविर वैसे ही लगे रहे, तीर्थयात्री वैसे ही स्नान करने आते रहे और माघ मेला उसी शांति व श्रद्धा से चलता रहा। सभ्यता एक बार फिर, दृढ़ता से खड़ी रही।
बीसवीं–इक्कीसवीं सदी : रूप बदले, पर प्रवृत्ति वही रही
समय बदला, पर धर्मांतरण करवाने वालों का षड्यंत्र जारी रहा। वर्ष 2009 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकर्ताओं ने चार ईसाई मिशनरियों को गंगा का अपमान करने वाले पर्चे बांटते पकड़ा। जनवरी 2023 में तीन इस्लामी प्रचारक, मौलवी महमूद हसन गाजी, मोहम्मद मोनिश (उर्फ आशीष गुप्ता) और समीर (उर्फ नरेश सरोज), विदेशी फंडिंग वाली इस्लामी किताबें बांटते हुए गिरफ्तार हुए।
रिपोर्टों के अनुसार, आज भी प्रयागराज में 443 मिशनरी टीमें सक्रिय हैं जो उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक हैं। लेकिन हर वर्ष, जैसे ही माघ मेला शुरू होता है, संगम फिर लाखों भगवा ध्वजों, संतों के डेरों और अपार भक्तों से भर जाता है, पहले से भी अधिक। भीड़ घटी नहीं बल्कि और बढ़ी है।
एक ऐसी सभ्यता, जो हर चुनौती से लंबी चली
वर्ष 1840 से 2025 तक मिशनरी प्रिंटिंग प्रेस, विदेशी फंडिंग, परिवर्तित पादरी, सरकारी समर्थन, मेले में शिविर सब कुछ आजमाया गया। हिंदुओं को धर्मांतरित करने वाले 1857 के बाद लौटे, 1900 के दशक में फैले, 2000 के दशक में पुनर्गठित हुए और आज भी मौजूद हैं। लेकिन माघ और कुम्भ मेले, भारत की जीवित सभ्यतागत स्मृति कभी नहीं रुकी। संगम पवित्र रहा, अनुष्ठान चलते रहे और सनातन धर्म का प्रवाह सदियों जैसा ही बहता रहा। मिशनरी प्रयास लगभग दो सौ वर्ष तक चले, पर सनातन सभ्यता तो हजारों वर्षों से चल रही है।

हर शीत ऋतु में, जब करोड़ों तीर्थयात्री संगम की ओर बढ़ते हैं, तो दुनिया देखती है कि कौन-सी शक्ति सच में अखंड रही है और जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता।

