गुजरात की रेत में एक भूली हुई कहानी दबी है। उस अज्ञात हिंदू की, जिसने महमूद गजनवी जैसे आततायी को अपने जीवन की अंतिम सांस तक पछताने पर मजबूर कर दिया।
सोमनाथ मंदिर के विध्वंस की कहानी तो सबने सुनी है, लेकिन शायद ही किसी ने उस हिंदू वीर का नाम जाना हो, जिसने भगवान सोमनाथ के अपमान का बदला अपने प्राण देकर लिया। यह कोई कहानी नहीं है, बल्कि वह जीवंत पल है, जब आस्था ने प्रतिशोध का रूप लेकर बदला लिया।
यह कहानी सन् 1025 ईस्वी की है, जब महमूद गजनवी ने अपनी क्रूर सेना के साथ गुजरात पर आक्रमण किया। उसने सिर्फ सोमनाथ मंदिर के अपार खजाने की लूटपाट ही नहीं की बल्कि पवित्र ज्योतिर्लिंग को क्षति भी पहुंचाई। यह घटना भारतीय सभ्यता के लिए सबसे पीड़ादायक क्षणों में से एक के रूप में सदैव दर्ज रहेगी।
इस विनाश के बाद गजनवी लाखों दीनार की कीमत का सोना-चांदी और हीरों से जड़े कीमती आभूषणों को घोड़ों, ऊंटों और हाथियों पर लादकर गुजरात से निकला। उसका उद्देश्य शीघ्रता से सिंध पहुंचना था, जिसके लिए उसे कच्छ के रण जैसे गरम प्राणघातक रास्ते से गुजरना था। इस रास्ते पर बस गरम रेत ही थी, न तो एक बूंद पानी और न ही कहीं छांव।
इस स्थिति में एक स्थानीय हिंदू युवक ने गजनवी के सामने खुद को मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया, तो गजनवी ने इसे साधारण संयोग समझा। उसे लगा कि यह युवा धन के लालच या फिर भयवश उसे रास्ता बताने आया है।
पर उस युवक के लिए यह कोई सामान्य यात्रा नहीं थी। यह उसका धर्मयुद्ध था। गजनवी ने उसकी आस्था पर प्रहार किया था। अब उसके लिए आया था, अपमान का उत्तर देने का क्षण। सोमनाथ के विध्वंस ने उसके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला जगा दी थी। वह जानता था कि रण की रेत, धैर्य और समय, तीनों उसके शस्त्र बन सकते हैं। यह केवल मार्गदर्शन नहीं था, यह हिंदुत्व के इतिहास का मौन प्रतिकार था।
उस युवक के साथ गजनवी की सेना दिन-रात तपते रेगिस्तान में भटकती रही। अगर सिर के ऊपर सूरज आग उगल रहा था, तो नीचे की रेत अंगारों की तरह धधक रही थी। अब घोड़े लड़खड़ाने लगे, हाथी बैठने लगे। गजनवी के सैनिक थकान व प्यास से बेहाल हो चुके थे। साथ लाया पानी जब समाप्त हो गया, तो हाहाकार मचने लगा। कई दिनों तक सेना को एक बूंद पानी भी न मिला।
हालात असहनीय होते देख महमूद गजनवी ने उस हिंदू युवक को बुलाया और गुस्से से पूछा कि पानी अब तक क्यों नहीं मिला? युवक ने शांत भाव से सिर झुका लिया। पर उसके चेहरे पर भय नहीं था, बल्कि होंठों पर एक मंद मुस्कान थी, मानो उसे किसी गहरे सत्य की प्राप्ति हो गई हो, उसका कोई बड़ा सपना पूरा होने वाला हो। युवक कुछ क्षण चुप रहा, पर उस मौन में प्रतिशोध की पूर्णता छिपी थी।
उस युवक ने जवाब दिया, “मेरा जीवन तो भगवान सोमनाथ को ही अर्पित है। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मैं जियूं या मरूं, लेकिन तुमने भगवान सोमनाथ के मंदिर को लूटा, मूर्तियों को छतिग्रस्त किया और हिंदुओं की आस्था को चोट पहुंचाई है, तुम्हारे इस घोर पाप का दंड अब इसी रेत के मैदान में मिलेगा।”
युवक ने आगे कहा, “मैं तुम्हें और तुम्हारी सेना को जानबूझकर इस विशाल रेगिस्तान के बीच लाया हूं, ताकि तुम सब यहां प्यास और तपिश से तड़प-तड़पकर दम तोड़ सको।”
युवक के ये शब्द सुनते ही महमूद गजनवी गुस्से से कांप उठा, उसके पैरों के तले की जमीन खिसक गई। अपनी जान को खतरे में महसूस कर वह क्रोध से तमतमा उठा। उसने झटके से तलवार निकाली और उस हिंदू वीर का सिर शरीर से अलग कर दिया। उस वीर की जान तो चली गई, लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। गजनवी की सेना के सैनिक रेगिस्तान की भयंकर गरमी और बेतहाशा प्यास से व्याकुल होकर एक-एक कर दम तोड़ने लगे।
इतिहास भले ही उस वीर हिंदू युवक का नाम दर्ज न कर पाया हो, किंतु उसकी प्राण-आहुति स्वयं इतिहास से भी अधिक अमर है। वह युवा अपने जीवन को धर्मरक्षा के यज्ञ में समर्पित कर एक शाश्वत प्रतीक बन गया। अकेले अपने अदम्य साहस, धैर्य और संकल्प के बल पर उसने एक शक्तिशाली आक्रांता के अहंकार को रण की रेत में धूल-धूसरित कर दिया। उसके पास न कोई सेना थी, न शस्त्र, फिर भी उसकी आस्था ही उसका अस्त्र बनी। उस युवक ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म की रक्षा केवल तलवारों और सेनाओं से नहीं होती, बल्कि अपराजेय आस्था, साहस और अटूट आत्मबल से भी होती है।

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इतिहास के पन्ने उस युवक के नाम को अपने में समेट नहीं पाए लेकिन सोमनाथ के प्रति उसकी आस्था और बलिदान युगों-युगों तक अमर रहेगा। फारसी इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज जुजजानी की पुस्तक ‘तबकात-ए-नासिरी’ में इस घटना का उल्लेख किया गया है। इस कहानी के बारे में सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स में सावित्री मुमुक्षु (@MumukshuSavitri) के ट्वीट थ्रेड्स में भी दी गई है.

