1950 का दशक। कलकत्ता (अब कोलकाता) की एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने वाला शांत युवक ने अपने मन में एक असंभव-सा सपना पाल लिया था। यह सपना था, फिल्म बनाने का, जो उस दौर में दिन में सपना देखने जैसा था।
यह युवक कोई और नहीं, बल्कि भारत के महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे थे। 2 मई 1921 को कोलकाता में जन्म लेने वाले सत्यजीत रे के पास पहली फिल्म बनाने के लिए न तो धन था और न ही अनुभव। फिर भी उनके दिल में एक कहानी धड़क रही थी, ‘पथेर पंचाली’ (पाथेर पांचाली भी प्रचलित) की।

उन्होंने लेखक बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय की विधवा पत्नी रमा चट्टोपाध्याय से कहानी का अधिकार प्राप्त किया। साथ ही यह ठान लिया कि इस उपन्यास की संवेदनशील दुनिया को परदे पर उतारकर दिखाना है। उस दौर में, भारतीय सिनेमा स्टूडियो-आधारित, गीत-संगीत तक सीमित था। जबकि रे अपनी फिल्म में गांव की मिट्टी, बारिश की बूंदें और मानवीय भावनाओं को कैमरे में कैद कर लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। लेकिन शायद उन्हें आने वाले संघर्ष और भारतीय सिनेमा के इतिहास में बनने वाले नए कीर्तिमान की भनक भी नहीं थी।
फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे, इमेज सोर्स- Eastmojo.com
बंगाली भाषी ‘पथेर पंचाली’ फिल्म बनाने के लिए 1950 से 1952 तक रे प्रोड्यूसरों के दरवाजे खटखटाते रहे। वे अपनी नोटबुक में दृश्यों के स्केच बनाते, संवाद लिखते और कहानी समझाते, पर हर जगह से एक ही उत्तर मिलता, ‘यह फिल्म नहीं चलेगी।’ सभी उन्हें स्टूडियो में फिल्म शूट करने की सलाह देते, लेकिन रे वास्तविक लोकेशन पर फिल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने 16mm कैमरे से बारिश का एक टेस्ट शूट कर दिखाया कि प्राकृतिक रोशनी और असली वातावरण में भी प्रभावी दृश्य संभव हैं। फिर भी किसी प्रोड्यूसर ने जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई।
अंततः 27 अक्टूबर 1952 को सत्यजीत रे ने अपनी जीवन बीमा पॉलिसी गिरवी रखी और दोस्तों-रिश्तेदारों से उधार लेकर फिल्म का पहला शॉट लिया, काश के फूलों के बीच अपू और दुर्गा का ट्रेन देखने वाला दृश्य। आर्थिक परेशानी के चलते वह नौकरी नहीं छोड़ सकते थे, इसलिए केवल अवकाश के दिन रविवार को फिल्म की शूटिंग होती थी।
इसी बीच एक बार जब सत्यजीत रे एक सप्ताह बाद लोकेशन पर टीम के साथ पहुंचे, तो गायें काश के फूल खा चुकी थीं। अब उन्हें आगे के सीन के लिए एक साल की प्रतिक्षा करनी पड़ी। यह संघर्ष, मानो उनकी धैर्य-परख परीक्षा बन चुका था।

फिल्म के कलाकार, पिक्चर क्रेडिट : विकीपीडिया
फिल्म के अधिकांश कलाकार अनट्रेंड थे और उनमें कई स्थानीय ग्रामीण थे। आखिर में एक साल के इंतजार के बाद फिल्म की लोकेशन कलकत्ता के पास बोराल गांव की चुनी गई। यहां न भव्य सेट था और न ही चमकदार परिधान। अगर कुछ था तो बस रे की फिल्म बनाने की जिद।
1953 में एक प्रोड्यूसर ने थोड़ी मदद की, लेकिन उस प्रोड्यूसर की खुद की ही फिल्म फ्लॉप हो गई, जिससे सत्यजित रे को उनके द्वारा मिलने वाली फंडिंग बंद हो गई। इस संकट के समय रे ने अपनी पत्नी बीजोया के जेवरों को गिरवी रखा लेकिन इससे मिलने वाली राशि पर्याप्त नहीं थी। आखिर में शूटिंग को फिर रोकना पड़ा। लेकिन रे अपनी जिद से पीछे नहीं हटे। उन्होंने करीब 4 हजार फीट फुटेज एडिट कर संभावित निवेशकों को दिखाया, लेकिन फिर भी सबने मना कर दिया। यह वह क्षण था, जब कोई भी हार मान सकता था, लेकिन रे अडिग रहे।
भाग्य ने एक नया मोड़ लिया। लगभग एक साल के ब्रेक के बाद, बंगाल सरकार ने सरकारी खजाने से फिल्म को आंशिक वित्तीय सहायता देने का निर्णय लिया। हालांकि, इसके साथ सख्त शर्तें थीं। हर महीने हिसाब-किताब का लेखा-जोखा पेश करना और शासन से कागजी मंजूरी लेना। सरकार से सहायता मिलने के बाद 1954 में फिल्म ‘पथेर पंचाली’ की शूटिंग दोबारा शुरू हुई। इसी बीच हॉलीवुड फिल्म निर्देशक जॉन हस्टन (John Huston) ने रे की फिल्म के चित्रों को देखा और वह बहुत प्रभावित हुए। जॉन हस्टन ने फिल्म की खुलकर प्रशंसा की, जिससे अंतरराष्ट्रीय जगत का ध्यान इस फिल्म की ओर गया।
बहुत मेहनत के बाद बनी पथेर पंचाली फिल्म 26 अगस्त 1955 को कलकत्ता में रिलीज हुई। प्रारंभिक दो सप्ताह प्रतिक्रिया औसत रही, लेकिन तीसरे सप्ताह से दर्शकों के बीच इसकी चर्चा होने लगी। सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी और फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल सिद्ध हुई। उस समय के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के लिए विशेष स्क्रीनिंग कराई गई और वह इस फिल्म की गहराई से प्रभावित हुए।
भारत में सफल होने के बाद फिल्म की गूंज अमेरिका तक पहुंची। जिसके बाद न्यूयॉर्क के 5th Avenue Playhouse में फिल्म रिलीज हुई। जिन लोगों को लगता था कि अमेरिकन भारतीय फिल्म क्यों देखेंगे? वे गलत साबित हुए। यहां फिल्म लगातार 36 सप्ताह तक चली और जर्मन फिल्म ‘द कैबिनेट ऑफ डॉ. कैलिगारी’ को पछाड़कर सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाली फिल्म का कीर्तिमान स्थापित किया।
फिल्म के सफल होने के बाद, 1956 में Cannes Film Festival में ‘पथेर पांचाली’ को “Best Human Document” का स्पेशल जूरी प्राइज मिला। मनीला में चूनीबाला देवी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान प्राप्त हुआ। फिल्म ने विश्वभर में लगभग दर्जन भर पुरस्कार जीते और भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी।
सत्यजीत रे का पांच वर्षों का संघर्ष सफल हुआ। गिरवी रखी पॉलिसी, पत्नी के जेवर, अधूरी फंडिंग और अनगिनत अस्वीकृतियों के बावजूद रे ने हार नहीं मानी। ‘पथेर पंचाली’ केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ निश्चय, सादगी और सच्चाई के बल पर सीमित संसाधनों से भी अमर कृति रची जा सकती है।
अपने जीवन में अनेक फिल्मों का निर्देशन करने वाले सत्यजीत रे का निधन 23 अप्रैल 1992, को कोलकाता में हुआ।

पथेर पांचाली के सम्मान में 1994 में डाक-टिकट। पिक्चर क्रेडिट : विकीपीडिया

