History is written by the victors, मतलब विजेताओं द्वारा ही इतिहास लिखा/लिखवाया जाता है। मुगल राज को भारत में स्थापित करने वाले बाबर का इतिहास भी कुछ वर्ष पहले तक इसी सिद्धांत के तहत लिखा गया, महिमामंडित करते हुए। लेकिन सच्चाई अब सामने आ रही है। बाबर बर्बर था, हिंदू-घृणा से सना हुआ, वीरता से लड़ने के बजाय वह युद्ध को मजहबी रंग देता था, जीत के लिए इस्लाम को ढाल बनाता था। अब का इतिहास इन तथ्यों के साथ लिखा जा रहा है, पुराने गढ़े गए भ्रम इन तथ्यों से टूट रहे हैं।
और पढ़ेंAuthor: Akansha T
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माई भागो : वैसाखी की भावना की योद्धा
हर साल, दुनिया भर के सिख 14 अप्रैल को वैसाखी मनाते हैं। यह दिन न केवल पंजाबी कैलेंडर में नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि हिम्मत, बराबरी और पक्के विश्वास के नए जन्म का भी प्रतीक है।
1699 में खालसा की स्थापना इस त्योहार के दिल में है, लेकिन बहादुरी की और भी कहानियां हैं जिन्होंने वैसाखी की भावना को आगे बढ़ाया। ऐसी ही एक कहानी माई भागो की है, एक ऐसी महिला जिसकी हिम्मत ने डर के एक पल को हमेशा के लिए आजादी के पल में बदल दिया।
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निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?
गलवान और ऑपरेशन सिंदूर यह साबित करते हैं कि परमाणु हथियारों से लैस शत्रुओं के सामने मजबूती से खड़े रहने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध (डिटरेंस) आवश्यक है। भारत और उसकी सीमाओं की कहानी बताती है कि निरस्त्रीकरण एक व्यक्तिपरक अवधारणा (सब्जेक्टिव) है।
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क्रांतिकारी मदनसिंह मतवाले : जब तिरंगा फहराकर निजाम की सत्ता को दी गई खुली ललकार
भारत की आजादी के समय, जब पूरा देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त होकर एक नए भविष्य का सपना देख रहा था, तब हैदराबाद रियासत का निजाम मीर उस्मान अली खान भारत से अलग होकर इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना देख रहा था। यह वही हैदराबाद था, जहां की लगभग 84 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू थी, लेकिन सत्ता, शासन और ताकत पूरी तरह निजाम और उसकी इस्लामिक रजाकार सेना के हाथों में थी। आजादी के बाद भी यहां भारतीय तिरंगे पर प्रतिबंध था और भारत माता का नाम लेना अपराध माना जाता था।
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ऑपरेशन पोलो से 153 वर्ष पहले भी हैदराबाद के निजाम ने मराठों के सामने टेके थे घुटने!
क्या आप जानते हैं, 1948 के भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन पोलो से करीब 153 वर्ष पहले ही मराठों ने हैदराबाद के निजाम को घुटनों के बल ला दिया था। 1795 में मराठों और निजाम की सेना के बीच हुए ‘खारदा युद्ध’ में निजाम की शर्मनाक हार हुई थी। खारदा का युद्ध एक ऐसी घटना है, जो अक्सर बड़ी लड़ाइयों की चमक में कहीं दब जाती है, लेकिन परिणाम भारत के लिए निर्णायक और दूरगामी था। यह युद्ध सिर्फ तलवारों और तोपों की टक्कर भर नहीं था, बल्कि निजाम के अहंकार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई भी थी, जिसके बाद मराठों की शक्ति को अंग्रेजों ने भी महसूस किया था। सवाल उठता है कि निजाम ने मराठों से टकराने का जोखिम क्यों लिया?
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सरहिंद की घेराबंदी : अफगानों ने जब महिलाओं और तीर्थयात्रियों का किया अपहरण, जानिए मराठों ने कैसे दिया था उत्तर?
सन् 1758 में जब मराठा सेना सरहिंद की घेराबंदी के लिए पंजाब की ओर बढ़ रही थी, तब अफगान कमांडर अब्दुस समद खान ने मल्हारराव होल्कर के परिवार की महिलाओं और तीर्थयात्रियों को बंदी बनवा लिया था, लेकिन मराठा गार्ड्स ने उन्हें वीरता के साथ छुड़ा लिया। यह वीरगाथा सरहिंद की घेराबंदी से ठीक पहले की है, जो मराठा इतिहास की एक छिपी हुई कथा है। आइए जानते हैं कि यह सब कैसे हुआ और किस तरह से इस घटना का मराठा सैनिकों ने त्वरित उत्तर दिया?
सब कुछ जनवरी 1758 के ठंडे महीने में आरंभ हुआ। उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य के क्षीण होने से शक्ति की शून्यता आ गई थी और अहमद शाह अब्दाली के अफगान आक्रमणों ने पंजाब को अस्थिर कर रखा था। मराठा साम्राज्य अब तक अपने चरम पर पहुंच चुका था और रघुनाथराव तथा मल्हारराव होल्कर के नेतृत्व में उनकी सेना दिल्ली जीतकर अब पंजाब की ओर बढ़ रही थी।
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जब मुगल सेना से घिर गए थे शिवाजी महाराज, तब संत तुकाराम ने क्या किया चमत्कार?
जब संत तुकराम ने कीर्तन को ढाल बनाकर शिवाजी महाराज की रक्षा की थी। यह बात है 17वीं सदी की। पुणे के पास स्थित लोहगांव में संत तुकाराम महाराज की कथा चल रही थी। उस दिन लोहगांव गांव में शाम ढलते ही माहौल तनावपूर्ण था। इस तनाव के बीच अपने हजारों भक्तों के साथ संत तुकाराम हरि-कीर्तन में लीन थे। तभी गांव वालों ने घोड़ों की टापों और तलवारों के टकराने की आहट सुनी। गांव को चारों ओर से मुगल सेना ने घेर रखा था।
ताल-मृदंग, ढोल-मजीरे की थाप पर, हरि कीर्तन में मग्न सभी अचानक सहम गए। इन्हीं लोगों में बीच में छत्रपति शिवाजी महाराज भी थे। क्योंकि वह शत्रुओं से युद्ध करते-करते अपनी सेना से अलग हो चुके थे। उन्हें किसी सुरक्षित स्थान की जरूरत थी। संत तुकराम खतरे को भांप गए थे। अब उनके सामने शिवाजी की रक्षा के साथ-साथ पूरे गांव की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी थी।
संत तुकाराम कौन थे? आखिर संत तुकराम जी ने कैसे शिवाजी महाराज की रक्षा की? कैसे उनसे प्रेरणा लेकर शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की? जीवन के अंत में स्वयं भगवान विठ्ठल (विष्णु) संत तुकाराम को क्यों लेने आए? यह लेख इन्हीं प्रश्नों के उत्तर के तौर पर लिखा गया है।
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टिन शेड्स से सितारों तक : कहानी भारत के पहले यू.आर. राव की
बेंगलुरु, 1960 का दशक। भारत का स्पेस प्रोग्राम एक साधारण स्थान से आरम्भ हुआ था। यह पीन्या इंडस्ट्रियल एस्टेट था, खाली टिन शेड वाला एक धूल भरा क्षेत्र। भारतीय अंतरिक्ष प्रोग्राम के पितामह विक्रम साराभाई ने उडुपी रामचंद्र राव को एक बड़ा कार्य सौंपा, भारत का पहला सैटेलाइट बनाना।
उडुपी रामचंद्र राव का जन्म 10 मार्च, 1932 को हुआ था। उन्हें कर्नाटक के इंडस्ट्रीज सेक्रेटरी सतीश चंद्रन से सहायता मिली। उन्होंने चार बड़े शेड लिए, हर एक 5,000 स्क्वैर फीट का। दो इलेक्ट्रॉनिक्स लैब बन गए। एक 1,500 स्क्वैर फीट का क्लीन रूम था, जिसमें सैटेलाइट को एक साथ रखा जाता था। गणेश चतुर्थी के दिन 11 सितंबर, 1972 को कार्य आरम्भ हुआ। एक छोटी सी टीम आगे 150 वैज्ञानिकों तक बढ़ गई। सबने दिन-रात कार्य किया।
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नहीं, केलॉग्स भारतीय नाश्ते की संस्कृति पर अधिकार नहीं कर सका: पोहा और पराठें अभी भी भारत की सुबह पर राज करते हैं
नेशनल सीरियल्स डे पर, हम आपके लिए 1994 में केलॉग्स के इंडियन ब्रेकफास्ट मार्केट में आने की एक मनोरंजक कथा लाए हैं। 1994 में, अमेरिकन सीरियल की बड़ी कंपनी केलॉग्स $65 मिलियन के सपने के साथ भारत आई। उसने मुंबई में एक प्लांट खोला और कॉर्न फ्लेक्स, बासमती राइस फ्लेक्स और व्हीट फ्लेक्स लॉन्च किए। यह हमारे भारतीय ब्रेकफास्ट पर नियंत्रण पाने का प्रयास था। ब्रेकफास्ट में, गरमागरम पोहा, इडली, डोसा और गरम परांठे पसंद करने वाले देश में, केलॉग्स ठंडे दूध के साथ ‘रेडी-टू-ईट’ सीरियल कैटेगरी बनाने की उम्मीद लेकर आया था।

कॉर्न फ्लैक्स, फोटो क्रेडिट : commons.wikimedia.org
हालांकि शुरुआत में इसकी चर्चा हुई, यह एक हाई-प्रोफाइल लॉन्च था, और इसकी क्वालिटी ग्लोबल थी, लेकिन जल्द ही सेल्स ने एक कड़वी सच्चाई सामने ला दी। इंडियन लोग विदेश से आए ब्रेकफास्ट के आइडिया को नहीं खरीद रहे थे और हमारे सांस्कृतिक खाने की चीजों पर कब्जा करने का उनका आइडिया, जिसमें ब्रेकफास्ट का एक अहम रोल होता है, बुरी तरह फेल हो गया।
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2020 गलवान घाटी संघर्ष और आदर्शवाद की सीमाएं : एक खतरनाक पड़ोस में निरस्त्रीकरण पर भारत का दृष्टिकोण
15 जून 2020 को, पूर्वी लद्दाख में ऊंचाई वाली गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं में झड़प हुई। यह चार दशकों से ज्यादा समय में हुई सबसे भयंकर झड़प थी। सैनिकों ने पत्थरों, रॉड और तात्कालिक उपलब्ध हथियारों से यह लड़ाई लड़ी। पर मुख्य बात यह रही कि दोनों तरफ से भयंकर हथियार होने के बाद भी कोई गोली नहीं चली। यह 1993 और 1996 में हुए कॉन्फिडेंस-बिल्डिंग एग्रीमेंट का नतीजा था, जिसमें लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हथियारों के प्रयोग न करने पर दोनों देश सहमत हुए थे।
इस टकराव ने एक विचित्र प्रश्न खड़ा किया : क्या विश्व में सभी युद्ध ऐसे ही लड़े जा सकते हैं, संयमित, तात्कालिक और नियंत्रित? गलवान झड़प ने सुझाव दिया कि विशेष स्थिति में भी तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इसने यह भी बताया कि ऐसी स्थितियां कितने कम पर कोमल होती हैं, खासकर परमाणु हथियारों वाले शत्रुओं के बीच।
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