जब संत तुकराम ने कीर्तन को ढाल बनाकर शिवाजी महाराज की रक्षा की थी। यह बात है 17वीं सदी की। पुणे के पास स्थित लोहगांव में संत तुकाराम महाराज की कथा चल रही थी। उस दिन लोहगांव गांव में शाम ढलते ही माहौल तनावपूर्ण था। इस तनाव के बीच अपने हजारों भक्तों के साथ संत तुकाराम हरि-कीर्तन में लीन थे। तभी गांव वालों ने घोड़ों की टापों और तलवारों के टकराने की आहट सुनी। गांव को चारों ओर से मुगल सेना ने घेर रखा था।
ताल-मृदंग, ढोल-मजीरे की थाप पर, हरि कीर्तन में मग्न सभी अचानक सहम गए। इन्हीं लोगों में बीच में छत्रपति शिवाजी महाराज भी थे। क्योंकि वह शत्रुओं से युद्ध करते-करते अपनी सेना से अलग हो चुके थे। उन्हें किसी सुरक्षित स्थान की जरूरत थी। संत तुकराम खतरे को भांप गए थे। अब उनके सामने शिवाजी की रक्षा के साथ-साथ पूरे गांव की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी थी।
संत तुकाराम कौन थे? आखिर संत तुकराम जी ने कैसे शिवाजी महाराज की रक्षा की? कैसे उनसे प्रेरणा लेकर शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की? जीवन के अंत में स्वयं भगवान विठ्ठल (विष्णु) संत तुकाराम को क्यों लेने आए? यह लेख इन्हीं प्रश्नों के उत्तर के तौर पर लिखा गया है।
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