Category: History

National heritage, historical events, founding narratives

  • कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर लाल किला ट्रायल : जब एक केस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

    कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर लाल किला ट्रायल : जब एक केस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

    5 नवंबर 1945 को दिल्ली की हवा कुछ और ही कहानी सुना रही थी। लालकिले की प्राचीर से ब्रिटिश सरकार न्याय का ढोंग रच रही थी, लेकिन बाहर खड़ा पूरा भारत ब्रिटिश सरकार के अंत का फैसला सुना चुका था। यह वही किला था, जहां कभी मुगल आक्रातांओं के फरमान गूंजते थे। वहां अब ब्रिटिश साम्राज्य लाल किले से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।

    कटघरे में खड़े थे आजाद हिंद फौज के कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों,उनके साथी कैप्टन शाहनवाज खान व कर्नल प्रेम कुमार सहगल और साथ में 17 हजार अन्य सैनिक। यह कोर्ट ट्रायल ही नहीं था, बल्कि ब्रिटिश राज और भारतीय चेतना के बीच सीधी टक्कर भी थी। जिसका भय इतना था कि क्रूर ब्रिटिश सामाज्य पहली बार सही फैसला सुनाने को मजबूर हुआ था।

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  • चित्तसिंहपुरा हत्याकांड : वो जमीन पर पड़ा रहा, सब मर गए… नानक सिंह की कहानी आपको झकझोर देगी

    चित्तसिंहपुरा हत्याकांड : वो जमीन पर पड़ा रहा, सब मर गए… नानक सिंह की कहानी आपको झकझोर देगी

    20 मार्च, 2000 की शाम को, उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के भारत दौरे से कुछ घंटे पहले, मिलिट्री स्टाइल की यूनिफॉर्म पहने 15-20 नकाबपोश आतंकवादी दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में सिख-बहुल चित्तसिंहपुरा गांव में घुस आए और अल्पसंख्यक सिख समुदाय को टारगेट करके कत्लेआम किया। वे दो ग्रुप में बंट गए, शौकीन मोहल्ला गुरुद्वारा और सिंह सभा सुमंदरी हॉल गुरुद्वारा के बाहर सिख लोगों को मुश्किल से 150 मीटर की दूरी पर घेर लिया और पॉइंट-ब्लैंक रेंज से अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें 36 आदमी मारे गए।

    इस हमले में करीब 30 महिलाएं विधवा हो गईं, कई बच्चे अनाथ हो गए और सिख समुदाय में भय फैल गया, जिससे कई परिवार घाटी छोड़कर चले गए। इसके बाद, कई सिख परिवारों ने अपनी सुरक्षा के डर और घाटी में अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता के कारण यह इलाका छोड़कर जम्मू और कश्मीर के दूसरे हिस्सों या राज्य के बाहर जाने का फैसला किया। वहां सिर्फ एक आदमी नानक सिंह बचा।

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  • कैसे छत्रपति संभाजी महाराज ने अंग्रेजों को जंजीरा के सिद्दियों के खिलाफ मोड़ दिया

    कैसे छत्रपति संभाजी महाराज ने अंग्रेजों को जंजीरा के सिद्दियों के खिलाफ मोड़ दिया

    छत्रपति शिवाजी महाराज के गुजर जाने के बाद, जब छत्रपति संभाजी महाराज ने स्वराज्य की जिम्मेदारी संभाली, तो उन्हें सिद्दियों से बहुत बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। औरंगजेब के समर्थन से, जंजीरा के सिद्दी कमांडर सिद्दी कासिम ने नागोथाने और पेण जैसे मराठा इलाकों में लूटपाट, आगजनी और हिंदू मंदिरों को अपवित्र करके आतंक का राज फैला दिया था।

    कमांडर सिद्दी कासिम को अंग्रेजों से भी चुपके से सपोर्ट मिल रहा था, जो मराठों के साथ उनकी साइन की हुई एक ट्रीटी का सीधा उल्लंघन था। इसलिए, अंग्रेजों और नतीजतन सिद्दियों, जो स्वराज्य में रुकावट डाल रहे थे, पर लगाम लगाने के लिए, संभाजी महाराज ने एक मजबूत और आक्रामक योजना बनाई, जिसका असर जल्द ही राजापुर की घटना में देखा गया।

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  • स्वामी शिवानंद बाबा के कालजयी जीवन से ‘पंच परिवर्तन’ की प्रेरणा

    स्वामी शिवानंद बाबा के कालजयी जीवन से ‘पंच परिवर्तन’ की प्रेरणा

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी सौवीं सालगिरह पर पंच परिवर्तन शुरू किया। यह भारतीय समाज में नई जान डालने के लिए एक बदलाव लाने वाला पांच-पॉइंट ब्लूप्रिंट है।

    यह कोई मॉडर्न आविष्कार नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता, मेलजोल और अनुशासन के हमेशा रहने वाले सनातन सिद्धांतों को दिखाता है। RSS के इसे बताने से बहुत पहले, आम भारतीय और साधु-संत इन आदर्शों को अपनाते थे। महायोगी स्वामी शिवानंद बाबा से बेहतर कोई इसे नहीं दिखा सकता, जो 129 साल के (जन्म 1896) पद्म श्री विजेता हैं और जिनका गंगा किनारे का कठोर जीवन इसका जीता-जागता प्रमाण है।

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  • पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन : यह भाषा आधारित राज्यों के बनने का रास्ता कैसे बना?

    पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन : यह भाषा आधारित राज्यों के बनने का रास्ता कैसे बना?

    19 अक्टूबर, 1952 को मद्रास के मायलापुर में बुलुसु संबमूर्ति के घर पर एक ऐतिहासिक घटना घटी, जब पोट्टी श्रीरामुलु ने तेलुगु बोलने वाले लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन आरंभ किया। श्रीरामुलु की मांग पक्की थी और तब किसी ने यह अंदाजा नहीं लगाया था कि यह भारत के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह से बदल देगा। उस समय की लीडरशिप भी यह अंदाजा नहीं लगा पाई थी कि यह सत्याग्रह आधुनिक भारतीय इतिहास में एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मचा देगा। 

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  • मुगल सैनिकों को मजहबी जहर पिला बाबर ने जीता था खानवा का युद्ध

    मुगल सैनिकों को मजहबी जहर पिला बाबर ने जीता था खानवा का युद्ध

    History is written by the victors, मतलब विजेताओं द्वारा ही इतिहास लिखा/लिखवाया जाता है। मुगल राज को भारत में स्थापित करने वाले बाबर का इतिहास भी कुछ वर्ष पहले तक इसी सिद्धांत के तहत लिखा गया, महिमामंडित करते हुए। लेकिन सच्चाई अब सामने आ रही है। बाबर बर्बर था, हिंदू-घृणा से सना हुआ, वीरता से लड़ने के बजाय वह युद्ध को मजहबी रंग देता था, जीत के लिए इस्लाम को ढाल बनाता था। अब का इतिहास इन तथ्यों के साथ लिखा जा रहा है, पुराने गढ़े गए भ्रम इन तथ्यों से टूट रहे हैं।

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  • माई भागो : वैसाखी की भावना की योद्धा

    माई भागो : वैसाखी की भावना की योद्धा

    हर साल, दुनिया भर के सिख 14 अप्रैल को वैसाखी मनाते हैं। यह दिन न केवल पंजाबी कैलेंडर में नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि हिम्मत, बराबरी और पक्के विश्वास के नए जन्म का भी प्रतीक है।

    1699 में खालसा की स्थापना इस त्योहार के दिल में है, लेकिन बहादुरी की और भी कहानियां हैं जिन्होंने वैसाखी की भावना को आगे बढ़ाया। ऐसी ही एक कहानी माई भागो की है, एक ऐसी महिला जिसकी हिम्मत ने डर के एक पल को हमेशा के लिए आजादी के पल में बदल दिया।

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  • निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करते हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

    गलवान और ऑपरेशन सिंदूर यह साबित करते हैं कि परमाणु हथियारों से लैस शत्रुओं के सामने मजबूती से खड़े रहने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध (डिटरेंस) आवश्यक है। भारत और उसकी सीमाओं की कहानी बताती है कि निरस्त्रीकरण एक व्यक्तिपरक अवधारणा (सब्जेक्टिव) है।  

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  • क्रांतिकारी मदनसिंह मतवाले : जब तिरंगा फहराकर निजाम की सत्ता को दी गई खुली ललकार

    क्रांतिकारी मदनसिंह मतवाले : जब तिरंगा फहराकर निजाम की सत्ता को दी गई खुली ललकार

    भारत की आजादी के समय, जब पूरा देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त होकर एक नए भविष्य का सपना देख रहा था, तब हैदराबाद रियासत का निजाम मीर उस्मान अली खान भारत से अलग होकर इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना देख रहा था। यह वही हैदराबाद था, जहां की लगभग 84 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू थी, लेकिन सत्ता, शासन और ताकत पूरी तरह निजाम और उसकी इस्लामिक रजाकार सेना के हाथों में थी। आजादी के बाद भी यहां भारतीय तिरंगे पर प्रतिबंध था और भारत माता का नाम लेना अपराध माना जाता था।

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  • ऑपरेशन पोलो से 153 वर्ष पहले भी हैदराबाद के निजाम ने मराठों के सामने टेके थे घुटने!

    ऑपरेशन पोलो से 153 वर्ष पहले भी हैदराबाद के निजाम ने मराठों के सामने टेके थे घुटने!

    क्या आप जानते हैं, 1948 के भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन पोलो से करीब 153 वर्ष पहले ही मराठों ने हैदराबाद के निजाम को घुटनों के बल ला दिया था। 1795 में मराठों और निजाम की सेना के बीच हुए ‘खारदा युद्ध’ में निजाम की शर्मनाक हार हुई थी। खारदा का युद्ध एक ऐसी घटना है, जो अक्सर बड़ी लड़ाइयों की चमक में कहीं दब जाती है, लेकिन परिणाम भारत के लिए निर्णायक और दूरगामी था। यह युद्ध सिर्फ तलवारों और तोपों की टक्कर भर नहीं था, बल्कि निजाम के अहंकार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई भी थी, जिसके बाद मराठों की शक्ति को अंग्रेजों ने भी महसूस किया था। सवाल उठता है कि निजाम ने मराठों से टकराने का जोखिम क्यों लिया?

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