5 नवंबर 1945 को दिल्ली की हवा कुछ और ही कहानी सुना रही थी। लालकिले की प्राचीर से ब्रिटिश सरकार न्याय का ढोंग रच रही थी, लेकिन बाहर खड़ा पूरा भारत ब्रिटिश सरकार के अंत का फैसला सुना चुका था। यह वही किला था, जहां कभी मुगल आक्रातांओं के फरमान गूंजते थे। वहां अब ब्रिटिश साम्राज्य लाल किले से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।
कटघरे में खड़े थे आजाद हिंद फौज के कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों,उनके साथी कैप्टन शाहनवाज खान व कर्नल प्रेम कुमार सहगल और साथ में 17 हजार अन्य सैनिक। यह कोर्ट ट्रायल ही नहीं था, बल्कि ब्रिटिश राज और भारतीय चेतना के बीच सीधी टक्कर भी थी। जिसका भय इतना था कि क्रूर ब्रिटिश सामाज्य पहली बार सही फैसला सुनाने को मजबूर हुआ था।
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