Category: History

National heritage, historical events, founding narratives

  • जब टैगोर को अपनी अर्जेंटीनाई प्रेरणा मिली

    जब टैगोर को अपनी अर्जेंटीनाई प्रेरणा मिली

    7 मई 1861 को, कलकत्ता के जोरासांको की हलचल भरी गलियों में, सुधारकों, संगीतकारों और विचारकों के एक परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ, एक ऐसा जीवन जिसने एक दिन भारत को उसका राष्ट्रगान और दुनिया को उसका पहला एशियाई नोबेल पुरस्कार विजेता दिया। वह थे रवींद्रनाथ टैगोर, एक कवि, दार्शनिक, संगीतकार और दूरदर्शी, जिनका काम सदियों और महाद्वीपों की सीमाओं को पार कर गया।

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  • सिर्फ तलवार से नहीं, कलम से भी लड़े थे संभाजी महाराज : ‘बुद्धभूषणम्’ जैसा महान ग्रंथ लिखने वाले योद्धा की अनसुनी कहानी

    सिर्फ तलवार से नहीं, कलम से भी लड़े थे संभाजी महाराज : ‘बुद्धभूषणम्’ जैसा महान ग्रंथ लिखने वाले योद्धा की अनसुनी कहानी

    सह्याद्रि की घाटियों में एक ऐसा नाम गूंजता है, जिसे इतिहास में प्रायः एक प्रखर योद्धा के रूप में स्मरण किया जाता है, वह नाम है, संभाजी महाराज का। अधिकांश लोग उन्हें महान छत्रपति और मुगलों के विरुद्ध लड़ने वाले वीर योद्धा के रूप में जानते हैं। 

    लेकिन इतिहास के पन्नों में संभाजी महाराज की एक और पहचान छिपी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। यह है एक महान संस्कृत विद्वान की। संभाजी महाराज केवल रणभूमि के योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वह एक ‘संस्कृत योद्धा’ भी थे, ऐसे विद्वान शासक, जिनकी कलम उतनी ही प्रखर थी, जितनी कि उनकी तलवार। उन्होंने संस्कृत और ब्रज भाषा में महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। जिसमें से ‘बुद्धभूषणम्’ उनकी प्रमुख रचना है। यह उनके गहन अध्ययन और बौद्धिक क्षमता का प्रमाण है। यही कारण है कि इतिहास में संभाजी महाराज को केवल वीरता से नहीं, बल्कि उनको विद्वता से भी समझने की आवश्यकता है।

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  • ‘काली मिर्च बहुत तीखी थी’ : कैसे भारतीय सैनिकों ने पहले विश्व युद्ध के दौरान पत्रों में सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल कर ब्रिटिश सेंसरशिप को मात दी

    ‘काली मिर्च बहुत तीखी थी’ : कैसे भारतीय सैनिकों ने पहले विश्व युद्ध के दौरान पत्रों में सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल कर ब्रिटिश सेंसरशिप को मात दी

    साल 1917 है। फ्रांस की खाइयों में कहीं, पहला विश्व युद्ध लड़ रहा एक भारतीय सैनिक, घर चिट्ठी लिखने बैठता है। वह अपने परिवार को सब कुछ बताना चाहता है, कड़ाके की ठंड, लगातार गोलियों की बौछार और युद्ध के मुश्किल हालात। लेकिन वह सोच में पड़ जाता है, क्योंकि उसे पता है कि उसका लिखा हर शब्द ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा अनुवादित किया जाएगा, पढ़ा जाएगा, और उसकी बारीकी से जांच की जाएगी। उसकी चिट्ठी निजी नहीं है। और फिर भी, इसके बावजूद, भारतीय सैनिकों ने चिट्ठियां लिखना बंद नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने अपना संदेश पहुंचाने के नए तरीके ढूंढ़ लिए। यह कहानी है कि कैसे पहले विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेंसरशिप को मात देकर भारत में अपने घर से जुड़े रहने का रास्ता निकाला।

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  • धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रवाद: नेहरू ने सोमनाथ समारोह का विरोध क्यों किया?

    धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रवाद: नेहरू ने सोमनाथ समारोह का विरोध क्यों किया?

    1951…, देश अभी-अभी आजदी की हवा में सांस लेना शुरू ही कर रहा था। लेकिन उस हवा में, बंटवारे के खून की महक अभी भी ताजा थी। अरब सागर के तट पर, सोमनाथ मंदिर अपनी खोई हुई शान वापस पा रहा था और हजार साल की गुलामी के जख्मों को भर रहा था। यह एक ऐसा पल था जब एक राष्ट्र अपनी खोई हुई आत्मा को फिर से हासिल कर रहा था। 

    हालांकि, ठीक उसी समय, दिल्ली की गद्दी पर बैठे बुद्धिजीवियों को यह ‘सांप्रदायिकता’ जैसा लगा। यहीं से यह सब शुरू हुआ, भारतीयता और बाहर से आई ‘धर्मनिरपेक्षता’ के बीच असली जंग!

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  • क्या है ‘घास की रोटी’ खाने वाली सच्चाई? जानिए अरावली में छिपा महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा रहस्य!

    क्या है ‘घास की रोटी’ खाने वाली सच्चाई? जानिए अरावली में छिपा महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा रहस्य!

    अरावली की पथरीली चट्टानों में आज भी एक वीर योद्धा की शौर्य गाथा गूंज रही है। यह गाथा है एक ऐसे वीर राजा की, जिसने वैभव से भरे महलों को छोड़कर, जंगलों को अपना घर बनाया। वह भी सिर्फ राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए। यह शौर्य गाथा है, मेवाड़ के राजा वीर महाराणा प्रताप की। 

    हल्दीघाटी के युद्ध (1576) में महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना ने मुगल आक्रांता अकबर की विशाल सेना के सामने वीरता से युद्ध किया। हजारों मुगल सैनिक मारे गए। लेकिन मुगलों के अपेक्षा प्रताप की सेना आधी भी नहीं थी। जिसके चलते महाराणा प्रताप ने मुगल सेना के साथ गुरिल्ला युद्ध करने की रणनीती बनाई, इसके लिए उन्हें अरावली की पहाड़ियों पर अपनी सेना व परिवार के साथ शरण लेनी पड़ी। 

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  • 93 दिन, तीन आतंकवादी और एक मिशन : भारत के ‘ऑपरेशन महादेव’ की इनसाइड स्टोरी—वह तलाशी,जिसने पहलगाम हमले का बदला लिया

    93 दिन, तीन आतंकवादी और एक मिशन : भारत के ‘ऑपरेशन महादेव’ की इनसाइड स्टोरी—वह तलाशी,जिसने पहलगाम हमले का बदला लिया

    एक साल पहले, 22 अप्रैल 2025 को, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में स्थित बैसरन घाटी के शांत घास के मैदान एक खौफनाक जगह में बदल गए थे, जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादियों के एक क्रूर आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। यह एक सुनियोजित हमला था, पहले हिंदू पुरुषों को अलग किया गया और फिर उनकी पत्नियों, बच्चों और परिवारों के सामने ही उन्हें बेहद करीब से गोली मार दी गई। 

    लेकिन भारत न तो इसे भूला, और न ही उन्हें माफ किया। इसके बाद के हफ्तों में, एक दृढ़ और व्यवस्थित जवाबी कार्रवाई ने आकार लेना आरम्भ किया, जिसका नतीजा ‘ऑपरेशन महादेव’  नाम के एक बेहद सटीक आतंकवाद-रोधी अभियान के रूप में सामने आया।  इस अभियान ने यह सुनिश्चित किया कि इस हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को ढूढ़ निकाला जाए और उन्हें सजा दिलाई जाए। आज, हम विस्तार से बता रहे हैं कि यह पूरा ऑपरेशन कैसे अंजाम दिया गया और इस क्रूर हमले के दोषियों को कैसे सजा के कटघरे तक पहुंचाया गया।

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  • कवि की कलम और योद्धा की तलवार : टैगोर और नेताजी के बीच का असाधारण बंधन

    कवि की कलम और योद्धा की तलवार : टैगोर और नेताजी के बीच का असाधारण बंधन

    भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में, कुछ मेल-जोल केवल राजनीतिक नहीं थे, वे पूरे एक युग के लिए मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ थे। ऐसा ही एक बंधन था रवींद्रनाथ टैगोर, वह कवि जो अहिंसा के उपासक थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच, जो जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे। उनके बीच केवल आपसी सम्मान ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक जुड़ाव था, जो राष्ट्र के प्रति अटूट प्रेम से ओत-प्रोत था। यदि एक का योगदान कविता था, तो दूसरे का योगदान वह क्रांति थी, जिसने उन कविताओं में प्राण फूंक दिए। यह इस बात का विश्लेषण है कि कैसे एक कवि ने अपने शब्दों के माध्यम से एक योद्धा के लिए सुरक्षा-कवच का काम किया, ठीक उस समय, जब वह राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था। 

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  • मोतीलाल नेहरू : पाश्चात्य रंग में रंगे विद्रोही, जिन्होंने खादी को चुना

    मोतीलाल नेहरू : पाश्चात्य रंग में रंगे विद्रोही, जिन्होंने खादी को चुना

    मोतीलाल नेहरू ने कभी धन-दौलत, पश्चिमी सूट और शाही आराम वाली जिंदगी जी थी। फिर जलियांवाला बाग की आवाजें उन तक पहुंचीं। धीरे-धीरे विलासिता की जगह त्याग ने ले ली।

    1861 में जन्मे मोतीलाल नेहरू का जीवन शुरू में सुख-सुविधाओं से भरा नहीं था। जब वे अभी छोटे ही थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था और परिवार को आर्थिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। अपनी लगन और कड़ी मेहनत से मोतीलाल ने कानून की पढ़ाई की और धीरे-धीरे इलाहाबाद की अदालतों में अपनी साख बनाई।

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  • वह चिंगारी जिसने ज़ुल्म को चुनौती दी – भारत के पहले सिख राष्ट्रपति, ‘ज्ञानी जैल सिंह’ का प्रेरणादायक संघर्ष

    वह चिंगारी जिसने ज़ुल्म को चुनौती दी – भारत के पहले सिख राष्ट्रपति, ‘ज्ञानी जैल सिंह’ का प्रेरणादायक संघर्ष

    ‘जहां भी जुल्म होगा, वहां क्रांति जरूर उठेगी!’ यह एक अटल सत्य है। इतिहास के पन्नों में दर्ज हर क्रांति का जन्म भूख, अपमान और अन्याय से ही हुआ है। जब 1946 में फरीदकोट रियासत में जुल्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, तब एक ऐसे योद्धा की कहानी सामने आई, जो लोगों की आवाज बना और जिसने उस जुल्म का डटकर मुकाबला किया। यह कहानी है ज्ञानी जैल सिंह के जीवन-संघर्ष की।

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  • फिल्म  राजा हरिश्चंद्र :  जब फिल्म में फिमेल रोल के लिए नहीं तैयार हुईं कोई महिला। जानिए, तब कैसे बनी थी फिल्म?

    फिल्म  राजा हरिश्चंद्र :  जब फिल्म में फिमेल रोल के लिए नहीं तैयार हुईं कोई महिला। जानिए, तब कैसे बनी थी फिल्म?

    भारतीय सिनेमा की शुरुआती दौर में जब दादासाहेब फाल्के ने 1913 में अपनी और भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, तो उस समय की सामाजिक परिस्थितियों ने एक अनोखी चुनौती खड़ी की। फिल्म की मुख्य नायिका, रानी तारामती की भूमिका किसी महिला द्वारा नहीं निभाई जा सकी, क्योंकि कोई भी महिला एक्टिंग के लिए तैयार नहीं थी।

    उस दौर में समाज में महिलाओं के लिए फिल्मों या थिएटर में काम करना वेश्यावृत्ति के समान माना जाता था। पर्दे की प्रथा, रूढ़िवादी सोच और परिवार की बदनामी के डर ने महिलाओं को स्क्रीन पर आने से पूरी तरह रोका हुआ था। फाल्के ने अखबारों में विज्ञापन दिए, नाचने वाली लड़कियों और वेश्याओं से संपर्क किया, लेकिन सब व्यर्थ रहा। कुछ वेश्याएं ऑडिशन के लिए आईं, लेकिन वे उस रोल के लिए फिट नहीं थीं, एक को चुना भी गया लेकिन उसके मालिक ने बीच में ही मना कर दिया।

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