1980 और 1990 के दशक आजाद भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक हैं। 1971 के युद्ध में अपनी पराजय और अपने पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के बाद, पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध सीधी लड़ाई छोड़ दी। अब उसने भारत को आंतरिक रूप से अस्थिर करने के लिए K2 (कश्मीर-खालिस्तान) रणनीति अपनाई। पंजाब में अलगाववादी हिंसा को बढ़ावा दिया, जबकि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का बेरहमी से जातीय सफाया किया गया।
पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से बढ़ते नुकसान के बावजूद, अमेरिका ने भारत की चिंताओं को सिर्फ ‘कानून और व्यवस्था’ का मामला बताकर खारिज कर दिया। पर 1999 में IC-814 जहाज के अपहरण ने कुछ समय के लिए वाशिंगटन को झटका दिया, जिससे दोनों देशों भारत और अमेरिका के बीच सन् 2000 में सीमित आतंकवाद विरोधी सहयोग हुआ।
फिर भी, 9/11 के हमलों तक अमेरिका का रवैया अत्यंत ठंडा ही रहा। पर 9/11 के हमलों के बाद एक रणनीतिक बदलाव आया। हैरानी की बात यह है कि बाद के सालों में भी, अमेरिका ने पाकिस्तान को फंडिंग देना जारी रखा, जबकि भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद के प्रायोजक के तौर पर उसकी भूमिका के साफ सबूत थे। वाशिंगटन एक जाने-माने आतंकी प्रायोजक का समर्थन क्यों करता रहता है? यह रिपोर्ट इसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करती है।

तालिबान-शासित कंधार में अपहरण के बाद इंडियन एयरलाइंस का IC-814 विमान, स्रोत : ndtv
रणनीतिक दृष्टिहीनता का दौर
1980 और 90 के दशक में, भारत आतंकवाद की जानलेवा पकड़ में फंसा हुआ था। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी, आम भारतीय नागरिकों को बेरहमी से मार रहे थे। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में भी पाकिस्तानी आतंकवादियों की संलिप्तता सामने आई थी। इसके अलावा, ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी घटनाओं और 1990 के दशक में कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद द्वारा किए गए खून-खराबे के दौरान, महाशक्ति अमेरिका चुप रहा। उस समय, आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत द्वारा आवाज उठाने के बावजूद, कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
उस समय अमेरिका की नजर में, भारत पीड़ित देश नहीं था, बल्कि केवल एक ऐसा देश था, जिसकी ‘अपने पड़ोसी के साथ कुछ दिक्कतें’ थीं। उन दिनों अमेरिका द्वारा पहना गया यह ‘रणनीतिक मुखौटा’ भारत के लिए एक अभिशाप बन गया। हालांकि, जब 24 दिसंबर, 1999 को IC-814 के अपहरण के जरिए भारत को फिर से निशाना बनाया गया, तो अमेरिका आखिरकार थोड़ा जागा। नतीजतन, 8 फरवरी, 2000 को उसने भारत के साथ मिलकर आतंकवाद विरोधी संघर्ष की दिशा में पहला कदम उठाया। फिर भी, तब जागने के बाद भी अमेरिका के कदम मजबूत या अचूक नहीं थे। लेकिन क्यों?
Operation Cyclone : The Original Sin of the Cold War
ऑपरेशन साइक्लोन: शीत युद्ध का मूल पाप या जड़

स्रोत : opindia
अमेरिका की रणनीतिक चुप्पी की जड़ें कोल्ड वॉर में हैं। अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के बाद सोवियत संघ को से हराने के लिए वाशिंगटन को एक प्रॉक्सी की जरूरत थी। वह प्रॉक्सी पाकिस्तान था। 1970 के दशक के आखिर और 1980 के दशक में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ऑपरेशन साइक्लोन शुरू किया, जो राष्ट्रपति जिमी कार्टर शासनकाल के दौरान शुरू किया गया एक खुफिया कार्यक्रम था। इसे उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जबिग्न्यू ब्रेजिंस्की ने आकार दिया था। पाकिस्तान के जरिए, अमेरिका ने चुपचाप अरबों डॉलर, हथियार और ट्रेनिंग अफगान मुजाहिदीन लड़ाकों को दिए। इन लोगों को हथियार दिए गए, संगठित किया गया और एक प्रॉक्सी युद्ध में ‘स्वतंत्रता सेनानी’ के रूप में महिमामंडित किया गया, जिसे अमेरिका सीधे लड़ना नहीं चाहता था।
जब 1989 में सोवियत सेनाएं आखिरकार पीछे हट गईं, तो वाशिंगटन ने जीत की घोषणा की और वहां से चला गया, लेकिन अब तक अफगानिस्तान तबाह हो गया था। अमेरिका के लिए तो यह युद्ध खत्म हो गया था, लेकिन अमेरिका द्वारा पाले-पोसे गए आतंकवादियों के लिए यह युद्ध खत्म नहीं हुआ था। सोवियत विरोधी युद्ध के दौरान बनाया गया जिहादी इकोसिस्टम इसलिए बचा रहा क्योंकि इसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने संरक्षित किया, नया रूप दिया और पाला-पोसा।
चूंकि अफगानिस्तान अब मुख्य युद्ध का मैदान नहीं रहा, इसलिए इन आतंकवादियों को एक नए लक्ष्य, भारत की ओर मोड़ दिया गया। मुजाहिदीन-युग के इंफ्रास्ट्रक्चर से पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद उभरे, जो उसी विचारधारा, ट्रेनिंग के तरीकों और अंतर्रष्ट्रीय नेटवर्क को जम्मू-कश्मीर और मुख्य भूमि भारत में आगे बढ़ा रहे थे।
इस बदलाव के सबसे जाने-माने चेहरों में से एक मसूद अजहर था। अजहर के नेतृत्व में, जैश-ए-मोहम्मद ने भारतीय धरती पर कुछ सबसे खतरनाक आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया।
- 2001 में भारत की संसद पर हमला, जिसमें 14 लोग मारे गए।
- 2016 में पठानकोट एयर फोर्स बेस पर हमला।
- 2019 में पुलवामा आत्मघाती हमला, जिसमें 40 CRPF जवान शहीद हो गए।
- इसके साथ ही, लश्कर-ए-तैयबा ने 26/11 मुंबई हमलों के दौरान अपनी पूरी ताकत दिखाई, जिसमें 166 नागरिक और विदेशी नागरिक मारे गए थे।
ये हिंसा की अलग-थलग घटनाएं नहीं थीं, ये शीत युद्ध के दौरान आरंभ हुए एक जिहादी प्रोजेक्ट का सिलसिला था।
भारत ने 1990 और 2000 के दशक में बार-बार संयुक्त राज्य अमेरिका को चेतावनी दी कि पाकिस्तान समर्थित जिहादी, जो सोवियत विरोधी युद्ध की आग में पले-बढ़े थे, अब भारतीय शहरों और सैनिकों पर हमला कर रहे हैं। परंतु उन चेतावनियों को अमेरिका ने नियमित रूप से क्षेत्रीय विवाद बताकर बार-बार खारिज कर दिया।
9/11 : दुनिया के लिए एक वेक-अप कॉल
दशकों तक, भारत ने आतंतवाद के विरुद्ध यह युद्ध अकेले लड़ा। जबकि बाकी दुनिया दूर से ही देख रही थी, भारतीय सैनिकों और नागरिकों ने वैश्विक उदासीनता की कीमत चुकाई। सीमा पार से प्रायोजित, प्रशिक्षित और संरक्षित आतंकवादी हमलों में हजारों लोग मारे गए। इस रणनीतिक अकेलेपन के दौर में जब भारत ने अपनी आत्मरक्षा के लिए परमाणु परीक्षण किए, तो संयुक्त राज्य अमेरिका ने समझदारी दिखाने के बजाय भारत पर ही प्रतिबंध लगा दिए, जिससे देश और भी रणनीतिक रूप से कोने में चला गया। यह भारत के आधुनिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक था।
हालांकि, 9/11 हमलों तक, अमेरिका ने इंटरनेशनल आतंकवाद को एक बड़ा खतरा नहीं माना था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि मुजाहिदीन, जो उसी की मदद से बड़े हुए थे, तालिबान और अल-कायदा बनकर खुद अमेरिका पर ही हमला करेंगे। 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका के न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद सेंटर धूल में मिल गया। इसमें करीब 3000 लोग मारे गए, तब अमेरिका को एहसास हुआ कि आतंकवाद की कोई क्षेत्रीय सीमा नहीं होती।
इसके ठीक एक महीने से भी कम समय के अंदर 1 अक्टूबर, 2001 को, पाकिस्तानी आतंकवादियों ने कश्मीर असेंबली को निशाना बनाया, जिसमें 38 आम नागरिक मारे गए। इस खून-खराबे के बाद, पहले अमेरिका में और फिर भारत में, भारत-अमेरिका संबंधों में एक बड़ा बदलाव आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए हाथ मिलाया।

स्रोत : theatlantic.com
रणनीतिक हितों का विरोधाभास
अमेरिका द्वारा भारत के साथ हाथ मिलाने के बावजूद, एक अजीब विरोधाभास बना हुआ है। अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक संबंध जारी रखे। वाशिंगटन का मानना है कि चीन का मुकाबला करने के लिए भारत जरूरी है लेकिन ‘आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध’ के लिए पाकिस्तान का समर्थन भी उतना ही जरूरी है। हालांकि भारत लगातार इस बात के सबूत देता रहा है कि पाकिस्तान आतंकी समूहों को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है, लेकिन अमेरिका अपने सुरक्षा हितों के कारण पाकिस्तान को पूरी तरह से छोड़ने में हिचकिचा रहा है।
अमेरिका के पाकिस्तान से चिपके रहने का कारण सिर्फ आतंकवाद नहीं है। इससे ज्यादा डरावना कारण है, पाकिस्तान के ‘परमाणु हथियार’। वाशिंगटन को डर है कि अगर पाकिस्तान अस्थिर हो जाता है, तो उसके परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ लग सकते हैं, जिससे दुनिया भर में बड़ी तबाही मच सकती है। इस तरह, अमेरिका-पाकिस्तान संबंध दोस्ती से ज्यादा एक ‘निगरानी’ मिशन है। 2011 में एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के मिलने या ISI के हक्कानी नेटवर्क से संबंधों के सबूत मिलने के बाद भी, वाशिंगटन पीछे नहीं हट सका।
शीत युद्ध के दौरान बनाया गया जिहादी इकोसिस्टम खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह और फैल गया। जब पाकिस्तान ने इसका दोबारा प्रयोग किया, तो इसने भारत की जमीन पर लंबे समय तक इंसानों को दुख पहुंचाया।
2000 में भारत-अमेरिका आतंकवाद विरोधी साझेदारी में देरी अज्ञानता का नतीजा नहीं थी, बल्कि पिछली रणनीतिक पसंद के नतीजों का सामना करने से लंबे समय तक इंकार करने का नतीजा थी।

