जैसे ही हम गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती, जिसे प्रकाश पर्व भी कहा जाता है, मनाते हैं और उन्हें याद करते हैं, तो हमें मुक्तसर की लड़ाई की सच्ची कहानी भी याद आ जाती है, जो एक मुश्किल समय में लड़ी गई थी। इस समय दसवें सिख गुरु गोबिंद सिंह जी मुगलों से भयंकर संघर्ष कर रहे थे। सिख इतिहास के सबसे भावनात्मक और हृदयविदारक अध्यायों में से एक यह युद्ध आज भी शौर्य, त्याग और वफादारी की मिसाल बनकर गूंजता है।
यह कहानी 40 सिख शिष्यों की है, जिन्होंने महान सिंह के नेतृत्व में अपनी जान के डर से आनंदपुर साहिब में ‘बेदावा’ (अस्वीकरण पत्र) पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन अगर मौत से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह है, अपने गुरु को छोड़ने का पछतावा। यही पछतावा, उन 40 सिखों को वापस युद्ध के मैदान में ले आया। यहां हम मुक्तसर की लड़ाई के बारे में विस्तार से जानेंगे, एक ऐसी कहानी, जो आंसुओं से लिखी गई है।
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