लखनऊ में दुनिया का एकमात्र ऐसा मंच, जहां दिखता है वैश्विक जनजातीय उत्सव में 38 कलाओं का संगम

Global Tribal Festival

15 नवंबर को देशभर में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है। यह दिन जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति व स्वाधीनता संग्राम में उनके असाधारण योगदान के लिए है भारत सरकार ने 2021 में भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन, प्रति वर्ष 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने की परंपरा प्रारंभ की थी जिसको देखते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते साल 2024 में ‘अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव’ का आयोजन प्रारंभ किया था जो प्रतिवर्ष 15 नवंबर से 20 नवंबर, यानी 6 दिनों तक लखनऊ में आयोजित होता है

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव’ एकमात्र ऐसा उत्सव है, जिसमें सिर्फ भारत के 22 राज्यों के ही नहीं, बल्कि स्लोवाकिया और वियतनाम में रहने वाले जनजातीय समाज के प्रतिनिधि भी भाग लेते हैं यह उत्सव दुनिया का एकमात्र ऐसा मंच है, जिसमें एक छत के नीचे, भारत से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक की, जनजातीय परंपराओं, कलाओं, हस्तशिल्प, लोकगीत, नृत्य, वेशभूषा, जनजातीय साहित्य और धार्मिक परंपराओं को करीब से देख सकते हैं उत्सव में जहां परांपरिक जनजातीय समाज के लोग भाग लेते हैं, वहीं  नट, बंजारा समूह, बहुरूपिया, भपंग वादन, कठपुतली कलाकार, घुमंतु समाज के लोग भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं

इमेज सोर्स- Bharat express 

भारत में जनजातीय समाज की जनसंख्या 10.45 करोड़ यानी कुल जनसंख्या की 8.6% है वहीं, यूपी में जनजातीय समाज की आबादी 11,34,273 है जनजातीय समाज को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते साल यानी 2024 में अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव मनाने की शुरुआत की थी यह उत्सव भगवान भगवान बिरसा मुंड की जयंती, 15 नवंबर से प्रारंभ होकर 20 नवंबर तक मनाया जाता है जो भगवान बिरसा मुंड की जयंती पर मनाया जाता है उत्सव में भारत के 22 राज्यों से जनजातीय समाज के कलाकार, शिल्पकार शामिल होते हैं जो सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ अपने हस्तशिल्पों की प्रदर्शनी लगाते हैं इस दौरान 38 लोक कलाओं का मंचन किया जाता है

जिन 38 लोक कलाओं का मंचन किया जाता है, उनमें उत्तर प्रदेश की डोमकच, झीझी, जवारा, नगमतिया और चंगेली नृत्य शामिल होता है वहीं, बिहार के उरांव, उत्तराखंड के झैंता, मध्य प्रदेश के भगौरिया, बैगा, रमढोला, पश्चिम बंगाल के नटुआ, मिजोरम के चेरांव, अरुणाचाल प्रदेश के अका, पंजाब के शम्मी, केरल के इरुला, छत्तीसगढ़ के गंडी, भुंजिया, माटी मांदरी नृत्य, हिमाचल प्रदेश के सिरमौरी नाटी, राजस्थान के कालबेलिया, लंगा, मागजिहार और तेराताली, असम के बरदोई, शिखला, त्रिपुरा के हौजागिरी, झारखंड के खड़िया, गोवा के कुनबी, गुजरात के सिद्धि धमाल, जम्मू-कश्मीर के मोंगो (बकरवाल), सिक्किम के सिंघी छम, महाराष्ट्र के सांघी मुखौटा, ओडिशा के घुड़का और कर्नाटक के फुगडी लोक नृत्य का प्रदर्शन होता है

इमेज सोर्स- दूरदर्शन

उत्सव में जनजातीय समाज द्वारा बने हस्तशिल्प उत्पादों, जनजातीय भोजन व व्यंजनों की प्रदर्शनी, जनजातीय त्योहार परंपराओं का मंचन, जनजातीय साहित्य, जनजातीय त्योहार, साहित्य के स्टॉल लगते हैं व मंचन किया जाता है

इमेज सोर्स- UP Lok Evem Janjati Sanskriti Sansthan Lucknow

अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव उत्तर प्रदेश का आयोजन 15 से 20 नवंबर तक होता है इसका आयोजन  उत्तर प्रदेश सरकार के लोक एवं जनजातीय संस्थान, लखनऊ, पर्यटन विभाग, जनजातीय विकास विभाग, समाज कल्याण मंत्रालय, संगीत नाटक कला अकादमी, लखनऊ, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, लखनऊ, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से किया जाता है

उत्सव में लगने वाली प्रदर्शनियां  

हस्तकला : उत्सव में जनजातीय समाज के लोगों द्वारा बनाए गए उत्पादों के स्टॉल लगाए जाते हैं जिसमें बांस से बने उत्पाद जैसे की बांस की टोकरी, हैट, गिफ्ट बॉक्स, सजावटी सामान और बेंत, वनऔषधि, जनजातीय पेंटिंग, धातु शिल्प, (ढोला-मारू कला, बस्तर का ढोकड़ा), मिट्टी के बर्तन, दरी, लकड़ी के खिलौने, आभूषण और हाथ से बने हुए वस्त्रों को 100 से अधिक स्टॉलों पर बिक्री के लिए रखा जाता है

इमेज सोर्स- Department Of Culture, Uttar Pradesh

भोजन परंपरा : जनजातीय समाज अपनी विशेष संस्कृति के लिए जाना जाता है इसमें भोजन भी शामिल है जनजातीय समाज कोदो, मक्का, मडुआ, जड़ीबूटी और महुआ से बने व्यंजनों को खाता है उत्सव में इस जनजातीय व्यंजनों की भी प्रदर्शनी लगाई जाती है

जनजातीय खेल : उत्सव में जनजातीय खेलों का भी प्रदर्शन होता है खेलों में तीरंदाजी, कुश्ती, गिल्ली-डंडा, मल्लखंब, कलारीपयट्टू और खो-खो जैसे खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं

जनजातीय साहित्य : उत्सव में जनजातीय साहित्य लोगों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पुस्तक मेले का भी आयोजन होता है 

धार्मिक परंपराएं : धार्मिक परंपराओं का मंचन जनजातीय कलाकारों द्वारा किया जाता है इसमें प्रकृति पूजा के तौर पर  सूर्य, चंद्रमा, वृक्ष, पर्वत, अन्न व वन देवता की पूजा की जाती है जैसे कि जनजातीय परंपरा में गोंड समाज में ‘फेन पेन’ और संथाल समाज में ‘मरांग बुरु’ देवता की पूजा की जाती है

इमेज सोर्स- UP Lok Evem Janjati Sanskriti Sansthan Lucknow

त्योहार : उत्सव में फसल कटाई जैसे कि सरहुल, कर्मा आदि त्योहारों का और शिकार न करने ( पूज्यनीय पशु) से जुड़े अनुष्ठानों का कलाकारों द्वारा मंचन किया जाता है कुछ जनजाति टोटेमिक परंपरा का पालन करती हैं, जो किसी विशिष्ट पशु, पक्षी या फिर पेड़ को अपना पूर्वज मानकर उनकी पूजा करते हैं इन परंपराओं का भी जनजातीय कलाकारों द्वारा मंचन किया जाता है

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पोथीघर : उत्सव स्थल पर पर ‘पोथीघर’ नाम की एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाती है जहां जनजातीय समाज का साहित्य उपलब्ध रहता है साहित्य में जन जातीय लोक कथाएं, लोक गीत, प्राचीन जनजातीय ज्ञान की पुस्तकें बिकती हैं जिससे  जनजातीय परंपराओं के बारे में लोग जान सकें    जनजातीय गौरव दिवस

लखनऊ में दुनिया का एकमात्र ऐसा मंच, जहां दिखता है वैश्विक जनजातीय उत्सव में 38 कलाओं का संगम

15 नवंबर को देशभर में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है। यह दिन जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति व स्वाधीनता संग्राम में उनके असाधारण योगदान के लिए है भारत सरकार ने 2021 में भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन, प्रति वर्ष 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने की परंपरा प्रारंभ की थी जिसको देखते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते साल 2024 में ‘अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव’ का आयोजन प्रारंभ किया था जो प्रतिवर्ष 15 नवंबर से 20 नवंबर, यानी 6 दिनों तक लखनऊ में आयोजित होता है

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव’ एकमात्र ऐसा उत्सव है, जिसमें सिर्फ भारत के 22 राज्यों के ही नहीं, बल्कि स्लोवाकिया और वियतनाम में रहने वाले जनजातीय समाज के प्रतिनिधि भी भाग लेते हैं यह उत्सव दुनिया का एकमात्र ऐसा मंच है, जिसमें एक छत के नीचे, भारत से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक की, जनजातीय परंपराओं, कलाओं, हस्तशिल्प, लोकगीत, नृत्य, वेशभूषा, जनजातीय साहित्य और धार्मिक परंपराओं को करीब से देख सकते हैं उत्सव में जहां परांपरिक जनजातीय समाज के लोग भाग लेते हैं, वहीं  नट, बंजारा समूह, बहुरूपिया, भपंग वादन, कठपुतली कलाकार, घुमंतु समाज के लोग भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं

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भारत में जनजातीय समाज की जनसंख्या 10.45 करोड़ यानी कुल जनसंख्या की 8.6% है वहीं, यूपी में जनजातीय समाज की आबादी 11,34,273 है जनजातीय समाज को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते साल यानी 2024 में अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव मनाने की शुरुआत की थी यह उत्सव भगवान भगवान बिरसा मुंड की जयंती, 15 नवंबर से प्रारंभ होकर 20 नवंबर तक मनाया जाता है जो भगवान बिरसा मुंड की जयंती पर मनाया जाता है उत्सव में भारत के 22 राज्यों से जनजातीय समाज के कलाकार, शिल्पकार शामिल होते हैं जो सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ अपने हस्तशिल्पों की प्रदर्शनी लगाते हैं इस दौरान 38 लोक कलाओं का मंचन किया जाता है

जिन 38 लोक कलाओं का मंचन किया जाता है, उनमें उत्तर प्रदेश की डोमकच, झीझी, जवारा, नगमतिया और चंगेली नृत्य शामिल होता है वहीं, बिहार के उरांव, उत्तराखंड के झैंता, मध्य प्रदेश के भगौरिया, बैगा, रमढोला, पश्चिम बंगाल के नटुआ, मिजोरम के चेरांव, अरुणाचाल प्रदेश के अका, पंजाब के शम्मी, केरल के इरुला, छत्तीसगढ़ के गंडी, भुंजिया, माटी मांदरी नृत्य, हिमाचल प्रदेश के सिरमौरी नाटी, राजस्थान के कालबेलिया, लंगा, मागजिहार और तेराताली, असम के बरदोई, शिखला, त्रिपुरा के हौजागिरी, झारखंड के खड़िया, गोवा के कुनबी, गुजरात के सिद्धि धमाल, जम्मू-कश्मीर के मोंगो (बकरवाल), सिक्किम के सिंघी छम, महाराष्ट्र के सांघी मुखौटा, ओडिशा के घुड़का और कर्नाटक के फुगडी लोक नृत्य का प्रदर्शन होता है

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उत्सव में जनजातीय समाज द्वारा बने हस्तशिल्प उत्पादों, जनजातीय भोजन व व्यंजनों की प्रदर्शनी, जनजातीय त्योहार परंपराओं का मंचन, जनजातीय साहित्य, जनजातीय त्योहार, साहित्य के स्टॉल लगते हैं व मंचन किया जाता है

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अंतरराष्ट्रीय जनजाति भागीदारी उत्सव उत्तर प्रदेश का आयोजन 15 से 20 नवंबर तक होता है इसका आयोजन  उत्तर प्रदेश सरकार के लोक एवं जनजातीय संस्थान, लखनऊ, पर्यटन विभाग, जनजातीय विकास विभाग, समाज कल्याण मंत्रालय, संगीत नाटक कला अकादमी, लखनऊ, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, लखनऊ, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से किया जाता है

उत्सव में लगने वाली प्रदर्शनियां  

हस्तकला : उत्सव में जनजातीय समाज के लोगों द्वारा बनाए गए उत्पादों के स्टॉल लगाए जाते हैं जिसमें बांस से बने उत्पाद जैसे की बांस की टोकरी, हैट, गिफ्ट बॉक्स, सजावटी सामान और बेंत, वनऔषधि, जनजातीय पेंटिंग, धातु शिल्प, (ढोला-मारू कला, बस्तर का ढोकड़ा), मिट्टी के बर्तन, दरी, लकड़ी के खिलौने, आभूषण और हाथ से बने हुए वस्त्रों को 100 से अधिक स्टॉलों पर बिक्री के लिए रखा जाता है

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भोजन परंपरा : जनजातीय समाज अपनी विशेष संस्कृति के लिए जाना जाता है इसमें भोजन भी शामिल है जनजातीय समाज कोदो, मक्का, मडुआ, जड़ीबूटी और महुआ से बने व्यंजनों को खाता है उत्सव में इस जनजातीय व्यंजनों की भी प्रदर्शनी लगाई जाती है

जनजातीय खेल : उत्सव में जनजातीय खेलों का भी प्रदर्शन होता है खेलों में तीरंदाजी, कुश्ती, गिल्ली-डंडा, मल्लखंब, कलारीपयट्टू और खो-खो जैसे खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं

जनजातीय साहित्य : उत्सव में जनजातीय साहित्य लोगों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पुस्तक मेले का भी आयोजन होता है 

धार्मिक परंपराएं : धार्मिक परंपराओं का मंचन जनजातीय कलाकारों द्वारा किया जाता है इसमें प्रकृति पूजा के तौर पर  सूर्य, चंद्रमा, वृक्ष, पर्वत, अन्न व वन देवता की पूजा की जाती है जैसे कि जनजातीय परंपरा में गोंड समाज में ‘फेन पेन’ और संथाल समाज में ‘मरांग बुरु’ देवता की पूजा की जाती है

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त्योहार : उत्सव में फसल कटाई जैसे कि सरहुल, कर्मा आदि त्योहारों का और शिकार न करने ( पूज्यनीय पशु) से जुड़े अनुष्ठानों का कलाकारों द्वारा मंचन किया जाता है कुछ जनजाति टोटेमिक परंपरा का पालन करती हैं, जो किसी विशिष्ट पशु, पक्षी या फिर पेड़ को अपना पूर्वज मानकर उनकी पूजा करते हैं इन परंपराओं का भी जनजातीय कलाकारों द्वारा मंचन किया जाता है

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