Recent Posts

  • मकर संक्रांति स्पेशल : सावित्रम्मा जैसी महिलाएं कैसे ₹300 करोड़ की संक्रांति स्नैक्स इकोनॉमी बना रही हैं

    मकर संक्रांति स्पेशल : सावित्रम्मा जैसी महिलाएं कैसे ₹300 करोड़ की संक्रांति स्नैक्स इकोनॉमी बना रही हैं

    मकर संक्रांति का त्योहार तेलुगु राज्यों, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सिर्फ एक बड़ा सांस्कृतिक उत्सव ही नहीं है, बल्कि यह एक मजबूत मौसमी अर्थव्यवस्था भी बन गया है। दिसंबर के आखिरी हफ्ते से लेकर 14 जनवरी तक, संक्रांति का मौसम उन हजारों महिलाओं की जिंदगी में रोशनी लाता है, जो पारंपरिक पकवान बनाती और बेचती हैं, जिन्हें दक्षिण में पिंडी वंटालू के नाम से जाना जाता है।

    और पढ़ें
  • मेजर मोहित शर्मा क्यों बन गए आतंकी इफ्तिखार भट्ट?

    मेजर मोहित शर्मा क्यों बन गए आतंकी इफ्तिखार भट्ट?

    मेजर मोहित शर्मा, भारतीय सेना के 1 पैरा स्पेशल फोर्सेज के एक बहादुर अधिकारी थे। उनका जन्म 13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक में हुआ था, लेकिन उनका पैतृक गांव मेरठ (उत्तर प्रदेश) के रासना में है। मेजर मोहित की सबसे बहादुरी भरी कहानी 2004 की उस साहसिक ऑपरेशन की है, जब उन्होंने खुद को आतंकवादी के रूप में छिपाकर हिजबुल मुजाहिदीन के गढ़ में घुसपैठ की और दो खूंखार आतंकियों को मार गिराया। यह घटना जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले (कश्मीर से 50 किमी दक्षिण) में घटी थी।

    और पढ़ें
  • हाजी पीर, 1965 : भारत की भुला दी गई रणनीतिक विजय

    हाजी पीर, 1965 : भारत की भुला दी गई रणनीतिक विजय

    हिमालय में, भूगोल रणनीति का सुझाव नहीं देता, बल्कि वह इसे तय करता है। डिप्लोमैट्स शायद बॉर्डर बना सकते हैं, लेकिन पहाड़ किसी संधि को नहीं मानते। ऐसा ही एक मुश्किल इलाका हाजी पीर पास है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऊंचाई वाला पहाड़ी दर्रा है, जो पीर पंजाल रेंज में है और पुंछ (भारत) को रावलकोट (पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर) से जोड़ता है। दशकों से, यह कश्मीर घाटी में घुसपैठ का सबसे सीधा रास्ता रहा है। कुछ ही जगहें बेहतर तरीके से यह दिखाती हैं कि कैसे जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा बंदूकें शांत होने के बहुत बाद भी रणनीति को आकार देता रहता है।

    और पढ़ें
  • जामा मस्जिद से स्वामी श्रद्धानंद का साहसिक भाषण, एक महिला का हिंदू धर्म अपनाने का फैसला : स्वामी जी का एक निर्भीक निर्णय

    जामा मस्जिद से स्वामी श्रद्धानंद का साहसिक भाषण, एक महिला का हिंदू धर्म अपनाने का फैसला : स्वामी जी का एक निर्भीक निर्णय

    पंजाब के तलवान गांव में जन्मे स्वामी श्रद्धानंद 1900 के दशक की शुरुआत में आर्य समाज के प्रमुख सुधारकों में से एक बनकर उभरे थे। उन्होंने वैदिक शिक्षा को फिर से अच्छे से प्रचलित करने के लिए 1902 में हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। उन्होंने बड़े पैमाने पर लोगों की हिंदू धर्म में घर वापसी भी करवाई और हिंदू एकता बनाने के लिए हर शहर में ‘हिंदू-राष्ट्र मंदिरों’ की कल्पना की।

    फोटो क्रेडिट : pmfias.com, justdial.com/Haridwar, careers360.com

    साल 1919 स्वामी श्रद्धानंद द्वारा हिंदुत्व को फिर से लोगों के हृदय में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण साल था। 4 अप्रैल, 1919 को दिल्ली की जामा मस्जिद में एक ऐतिहासिक पल में, उन्होंने हिंदुत्व को फिर से महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के लिए अपना बड़ा प्लान बताया। स्वामी जी ने 25,000 लोगों के बैठ सकने लायक बड़े मंदिरों की अपनी योजनाओं के बारे में भी बताया, जहां वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत का अध्ययन होता और साथ ही मार्शल आर्ट ट्रेनिंग के लिए अखाड़े और हर दीवार पर गायत्री मंत्र लिखे होने की बात कही। 

    उनकी घोषणा का समर्थकों ने जोरदार समर्थन किया, लेकिन कट्टरपंथियों का विरोध चुपचाप बढ़ रहा था। इस ऐतिहासिक पल ने कई लोगों को प्रेरित किया और धर्म परिवर्तन की ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी का स्वामी के जीवन पर तुरंत असर पड़ा। यह लेख आपको स्वामी के जीवन की यह महत्वपूर्ण कहानी बताता है।

    25 मार्च, 1926 को दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में, असगरी बेगम नाम की एक मुस्लिम महिला ने अपने दो छोटे बेटों और सौतेली बेटियों के साथ सबके सामने इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म अपना लिया। स्वामी श्रद्धानंद के मार्गदर्शन में, उन्होंने पवित्र शुद्धि संस्कार कार्यक्रम में भाग लिया। यह वैदिक जड़ों को फिर से अपनाने का एक शुद्धिकरण समारोह था। उस दिन से असगरी बेगम शांतिदेवी बन गईं।

    इस धर्म परिवर्तन की खबर दिल्ली की गलियों में आग की तरह फैल गई, जिससे सुधारवादियों में खुशी तो असगरी के कट्टरपंथी रिश्तेदारों में गुस्सा फैल गया। तीन महीने बाद, असगरी के रिश्तेदारों ने मंदिर पर धावा बोल दिया और असगरी से इस्लाम में वापस आने की मांग की। 

    असगरी  जो अब शांतिदेवी थी, को धमकियां दी गईं, जान से मारने की बात भी कही गई, लेकिन अपने निर्णय पर अडिग शांतिदेवी ने इस्लाम में लौटने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “मैंने अपना रास्ता चुन लिया है।” असगरी यानी शांतिदेवी अपने धर्म परिवर्तन के निर्णय से टस से मस नहीं हुईं। ऐसे में स्वामी श्रद्धानंद ने शांतिदेवी के स्वनिर्णय लेने के अधिकार की सराहना की और उन्हें अपना पूरा समर्थन दिया।

    कट्टरपंथियों के उकसाने से सारा माहौल गुस्से से भर गया। इस एक घटना ने सांप्रदायिक दरारों को और गहरा कर दिया, जिससे जामा मस्जिद में विरोध को एक साजिश का रूप दे दिया गया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने असगरी यानी शांतिदेवी का समर्थन करने के कारण स्वामी श्रद्धानंद से बदला लेने की साजिश रची।

    23 दिसंबर, 1926 का दिन था। स्वामी श्रद्धानंद बीमार थे और ब्रोंकाइटिस निमोनिया से पीड़ित थे। वह दिल्ली के नया बाजार स्थित अपने घर में थे। तभी अब्दुल राशिद ने स्वामी जी पर तीन गोलियां चलाईं। गोलियां स्वामी जी को लगीं और इस तरह स्वामी श्रद्धानंद ने अपने आदर्शों और देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया, वह धर्म की राह पर चलते हुए शहीद हो गए।

    रत्नागिरी से निर्वासन के दौरान, सावरकर ने 10 जनवरी, 1927 को श्रद्धानंद साप्ताहिक को आरम्भ किया, जो स्वामी श्रद्धानंद को एक जोशीली श्रद्धांजलि थी। यह साप्ताहिक वास्तव में एकता, शुद्धि और छुआछूत से निराकरण का मिश्रण था। परंतु 1930 में यह बंद हो गया।

    फोटो क्रेडिट : x.com/sameer_kasture

    परंतु इस घटना ने यह बात अमर कर दी कि कैसे एक दूरदर्शी भाषण, एक महिला की आजादी और क्रूर कट्टरपंथ ने इतिहास को बदल दिया। स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे राशिद को 1927 में फांसी दे दी गई, और किसी को आश्चर्य नहीं हुआ जब फांसी के इस फैसले की महात्मा गांधी ने आलोचना की थी।

  • कैसे एक अज्ञात हिंदू युवक ने महमूद गजनवी से लिया सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का बदला?

    कैसे एक अज्ञात हिंदू युवक ने महमूद गजनवी से लिया सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का बदला?

    गुजरात की रेत में एक भूली हुई कहानी दबी है। उस अज्ञात हिंदू की, जिसने महमूद गजनवी जैसे आततायी को अपने जीवन की अंतिम सांस तक पछताने पर मजबूर कर दिया। 

    सोमनाथ मंदिर के विध्वंस की कहानी तो सबने सुनी है, लेकिन शायद ही किसी ने उस हिंदू वीर का नाम जाना हो, जिसने भगवान सोमनाथ के अपमान का बदला अपने प्राण देकर लिया। यह कोई कहानी नहीं है, बल्कि वह जीवंत पल है, जब आस्था ने प्रतिशोध का रूप लेकर बदला लिया।

    और पढ़ें
  • ‘महिलाओं की हत्या नहीं’ : चार्ली हेब्दो हमले में कुरान, हिजाब और धर्मांतरण की मांग : एक जिंदा बची महिला की कहानी

    ‘महिलाओं की हत्या नहीं’ : चार्ली हेब्दो हमले में कुरान, हिजाब और धर्मांतरण की मांग : एक जिंदा बची महिला की कहानी

    एक फ्रेंच व्यंग्य साप्ताहिक मैगजीन चार्ली हेब्दो द्वारा बार-बार छापे गए ‘पैगंबर मुहम्मद’ के एक व्यंग्य कार्टून से नाराज होकर कौआची भाइयों ने 7 जनवरी, 2015 को पेरिस में उसके ऑफिस पर हमला किया। इस हमले में 10 मिनट से भी कम समय में 12 लोग मारे गए। दुनिया ने फ्रांस में जन्मे दो अल्जीरियाई मुस्लिम भाइयों, सईद कौआची और चेरिफ कौआची द्वारा किए गए एक भयानक आतंकवादी गोलीबारी हमले को देखा।

    और पढ़ें
  • जब ब्रिटिश अदालतें ऐसी भाषा में बोलीं, जिसे लोग पढ़ नहीं सकते थे :  भारतेन्दु हरिश्चंद्र का हिंदी के लिए संघर्ष 

    जब ब्रिटिश अदालतें ऐसी भाषा में बोलीं, जिसे लोग पढ़ नहीं सकते थे :  भारतेन्दु हरिश्चंद्र का हिंदी के लिए संघर्ष 

    उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के करोड़ों लोगों के लिए किसी मुकदमे की शुरुआत ऐसे सम्मन (नोटिस) से होती थी- 

    آپ کو بذریعۂ ہذا اس عدالت کے روبرو مقررہ تاریخ کو حاضر ہونے کا حکم دیا جاتا ہے۔

    क्या आप इसे समझ पाए? यही भाषा ब्रिटिश राज में अदालत के आदेशों में प्रयोग होती थी। आम ग्रामीण या वह व्यक्ति, जिसे उर्दू नहीं आती थी, इस संदेश का अर्थ ही नहीं समझ पाता था।

    यह समझने के लिए कि अदालत ने उसे क्यों बुलाया है, एक गांव का व्यक्ति मजबूर होकर किसी मौलवी या मुंशी के पास जाता, जो उसे पैसे लेकर इसका अर्थ समझाता, “आपको एतद् द्वारा निर्देशित किया जाता है कि आप नीचे दी गई तारीख को इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित हों।” या अंग्रेजी में- “You are hereby summoned to appear before this Court on the date specified below.”

    इस प्रकार, अदालत और नागरिक के बीच भाषा की एक दीवार खड़ी थी। न्याय आम आदमी के लिए महंगा सौदा बन गया था। लेकिन ऐसा क्यों हुआ? और आज हमें न्यायालय के सम्मन हिंदी में क्यों मिलते हैं?

    दरअसल, ब्रिटिश शासन ने भाषा को बांटो और राज करो (Divide and Rule) की नीति का एक औजार बना दिया था और हमारे पूर्वजों में कई ऐसे थे जिन्होंने इस अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। उन्हीं में से एक थे भारतेन्दु हरिश्चंद्र।

    और पढ़ें
  • मुक्तसर की लड़ाई: ‘चाली मुक्ते’ ने मुगलों के खिलाफ गुरु गोबिंद सिंह जी के लिए कैसे लड़ाई लड़ी

    मुक्तसर की लड़ाई: ‘चाली मुक्ते’ ने मुगलों के खिलाफ गुरु गोबिंद सिंह जी के लिए कैसे लड़ाई लड़ी

    जैसे ही हम गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती, जिसे प्रकाश पर्व भी कहा जाता है, मनाते हैं और उन्हें याद करते हैं, तो हमें मुक्तसर की लड़ाई की सच्ची कहानी भी याद आ जाती है, जो एक मुश्किल समय में लड़ी गई थी। इस समय दसवें सिख गुरु गोबिंद सिंह जी मुगलों से भयंकर संघर्ष कर रहे थे। सिख इतिहास के सबसे भावनात्मक और हृदयविदारक अध्यायों में से एक यह युद्ध आज भी शौर्य, त्याग और वफादारी की मिसाल बनकर गूंजता है।

    यह कहानी 40 सिख शिष्यों की है, जिन्होंने महान सिंह के नेतृत्व में अपनी जान के डर से आनंदपुर साहिब में ‘बेदावा’ (अस्वीकरण पत्र) पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन अगर मौत से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह है, अपने गुरु को छोड़ने का पछतावा। यही पछतावा, उन 40 सिखों को वापस युद्ध के मैदान में ले आया। यहां हम मुक्तसर की लड़ाई के बारे में विस्तार से जानेंगे, एक ऐसी कहानी, जो आंसुओं से लिखी गई है।

    और पढ़ें
  • माघ मेले में धर्मयुद्ध या आस्था की परीक्षा : 1840 से मतांतरण और मिशनरी चुनौतियों के बावजूद क्यों नहीं झुका प्रयागराज?

    माघ मेले में धर्मयुद्ध या आस्था की परीक्षा : 1840 से मतांतरण और मिशनरी चुनौतियों के बावजूद क्यों नहीं झुका प्रयागराज?

    यह संघर्ष वर्ष 1840 में शुरू हुआ, जब अमेरिकी प्रेस्बिटेरियन मिशन के पादरी जोसेफ ओवेन प्रयागराज पहुंचे। उनके लिए यह मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन भर नहीं था, बल्कि वह ‘स्वर्ण भूमि’ थी, जहां एक साथ हजारों लोगों को प्रभावित किया जा सकता था, धर्मांतरित किया जा सकता था। पर वह यह नहीं समझ पाए कि वह एक ऐसी सभ्यता में प्रवेश कर रहे हैं, जो उनकी कल्पना से कहीं अधिक प्राचीन और कहीं अधिक सशक्त थी।

    और पढ़ें
  • सावित्रीबाई फुले का 1874 का बच्चा गोद लेने का मामला हमें आधुनिक भारत में बाल अधिकारों के बारे में क्या सिखाता है?

    सावित्रीबाई फुले का 1874 का बच्चा गोद लेने का मामला हमें आधुनिक भारत में बाल अधिकारों के बारे में क्या सिखाता है?

    जब हम 3 जनवरी को भारत की पहली महिला हेडमिस्ट्रेस, सावित्रीबाई फुले की जयंती मना रहे हैं, तो आइए, 1874 में वापस चलते हैं, जब उन्होंने एक विधवा महिला के छोड़े हुए नवजात बच्चे को गोद लिया और उसका नाम यशवंतराव बालक फुले रखा। ऐसे समय में जब विधवा महिलाओं के बच्चों और सेक्स ट्रैफिकिंग की शिकार महिलाओं के बच्चों को ‘नाजायज’ कहा जाता था, सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले का यह फैसला भारत में एक अनाथ बच्चे को प्यार और मकसद भरी जिंदगी देने के शुरुआती और सबसे मजबूत उदाहरणों में से एक था।

    लेकिन इस कहानी को समझना जरूरी क्यों है? जब समाज इन बच्चों को जीने नहीं देना चाहता था, तब सावित्रीबाई ने ऐसा साहसी कदम कैसे उठाया  और एक अनाथ बच्चे को गोद लेने का सावित्रीबाई का फैसला आज भी कैसे गूंजता है? आज, हम आगे के आर्टिकल में इन सभी सवालों के जवाब देंगे।

    और पढ़ें