मेजर मोहित शर्मा क्यों बन गए आतंकी इफ्तिखार भट्ट?

मेजर मोहित शर्मा

मेजर मोहित शर्मा, भारतीय सेना के 1 पैरा स्पेशल फोर्सेज के एक बहादुर अधिकारी थे। उनका जन्म 13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक में हुआ था, लेकिन उनका पैतृक गांव मेरठ (उत्तर प्रदेश) के रासना में है। मेजर मोहित की सबसे बहादुरी भरी कहानी 2004 की उस साहसिक ऑपरेशन की है, जब उन्होंने खुद को आतंकवादी के रूप में छिपाकर हिजबुल मुजाहिदीन के गढ़ में घुसपैठ की और दो खूंखार आतंकियों को मार गिराया। यह घटना जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले (कश्मीर से 50 किमी दक्षिण) में घटी थी।

अंडरकवर मिशन : आतंकी बनकर घुसपैठ, फिर दुश्मन का सफाया :

मेजर मोहित ने इस खतरनाक मिशन के लिए खुद को पूरी तरह बदल लिया। उन्होंने लंबे बाल किए और दाढ़ी बढ़ाई, कश्मीरी भाषा सीखी और नाम रखा इफ्तिखार भट्ट। वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश आए, जिसका भाई 2001 में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मारा गया था। उन्होंने आतंकियों को बताया कि वह अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहते हैं और भारतीय सेना पर हमला करने के लिए हथियारों की जरूरत है। यह झूठी कहानी इतनी विश्वसनीय थी कि हिजबुल मुजाहिदीन के दो प्रमुख आतंकी, अबू तोरारा और अबू सब्जार, उन पर भरोसा करने लगे।

आतंकवादी के भेष में मेजर मोहित शर्मा (फोटो क्रेडिट: Honourpoint Website)

मेजर मोहित ने इन आतंकियों के साथ गहरी मित्रता कर ली और धीरे-धीरे उनके नेटवर्क की पूरी जानकारी जुटा ली। उन्होंने आतंकियों को विश्वास दिलाया कि वह उनके साथ मिलकर सेना पर ग्रेनेड हमला करेंगे। तोरारा और सब्जार ने उनके लिए ग्रेनेडों का इंतजाम किया और पास के गांव से तीन अन्य आतंकियों को भी बुला लिया। इस दौरान मेजर मोहित ने आतंकियों के आंतरिक ढांचे, हथियारों के स्रोत और योजनाओं की गुप्त खुफिया जानकारी जुटाई, जो सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।

कुछ दिनों बाद, जब ऑपरेशन चरम पर पहुंचा, तो आतंकी तोरारा और सब्जार को मेजर पर शक होने लगा। वे मेजर के बारे में जानकारी जुटाने लगे। मेजर मोहित इस स्थिति को भलीभांति समझ गए। ऐसे में मेजर ने आतंकियों से कहा, “अगर तुम्हें मुझ पर शक है, तो मुझे मार डालो।” उन्होंने अपनी AK-47 राइफल जमीन पर रख दी और बोले, “अगर विश्वास नहीं है, तो मुझे गोली मार दो।” 

यह सुनकर तोरारा हक्का-बक्का रह गया और सब्जार की ओर देखने लगा। ठीक इसी पल मेजर मोहित ने मौका लपका। उन्होंने अपनी छिपाकर रखी हुई 9 एमएम पिस्तौल निकाली और दोनों आतंकियों अबू तोरारा और अबू सब्जार को गोली मारकर ढेर कर दिया। यह हमला इतना तेज और सटीक था कि दोनों आतंकी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही ढेर हो गए।

यह घटना किताब India’s Most Fearless 2, में शीर्षक ‘Killed, Maybe, But Never Caught’ में विस्तार से वर्णित है. इस किताब को जाने-माने लेखक शिव अरूर और राहुल सिंह ने लिखा है।

वीरता की मिसाल और अंतिम बलिदान : 

वर्ष 2009 में मेजर मोहित शर्मा की यूनिट जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में तैनात थी। 21 मार्च को खबर मिली कि आतंकी, हफरुदा के घने जंगल में घुस आए हैं। सेना ने तुरंत सर्च ऑपरेशन शुरू किया और मेजर मोहित को ब्रावो असाल्ट टीम का नेतृत्व सौंपा गया। वह अपने कमांडो के साथ जंगल में पहुंचे ही थे कि तीन तरफ से अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। टीम के चार कमांडो बुरी तरह घायल हो गए। परंतु मेजर शर्मा जरा भी नहीं डरे। उन्होंने ग्रेनेड फेंके और दो आतंकियों को मार गिराया। तभी उनकी छाती में एक गोली लगी और वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

परंतु तब भी बहादुर मेजर शर्मा नहीं रुके। घायल अवस्था में भी साथियों को आदेश देते रहे और आतंकियों को वहां से भागने नहीं दिया। अपने जवानों को बचाने के लिए वह आगे बढ़े और करीबी मुकाबले में दो और आतंकियों को खत्म कर दिया। आखिरकार गंभीर चोटों की वजह से मेजर मोहित शर्मा शहीद हो गए। उस दिन उनके साथ चार और बहादुर सैनिक भी शहीद हुए, हवलदार संजय सिंह, हवलदार अनिल कुमार, कैप्टन शब्बीर अहमद मलिक और कैप्टन नटेर सिंह। मेजर मोहित शर्मा ने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनकी बलिदान को सदा याद किया जाएगा।

मेजर मोहित शर्मा के नाम पर यादगार :

मेजर मोहित शर्मा की बहादुरी को एक फिल्म में भी दर्शाया गया है। फिल्म ‘इफ्तिकार’ (2022) उनके गुप्त मिशन और शहादत की कहानी कहती है। 

उनकी याद में गाजियाबाद में उनकी मूर्ति स्थापित है और मार्च 2019 में राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन का नाम ‘मेजर मोहित शर्मा राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन’ रखा गया। 

वेश बदलकर दुश्मन के गढ़ में घुसने वाले और हफरुदा जंगल में अंतिम सांस तक लड़ने वाले, मेजर मोहित शर्मा सच्चे सैनिक की मिसाल हैं।

15 अगस्त 2009 को भारत सरकार ने घोषणा की कि मेजर मोहित शर्मा को देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार, अशोक चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया जाएगा। 26 जनवरी 2010 को, उनकी पत्नी मेजर रिशिमा शर्मा ने भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से यह पुरस्कार ग्रहण किया। 

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